
जल्दी जा रे द्वी हजार बीस
रचनाकार: दीपक चन्द्र सनवाल
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जल्दी जा रे द्वी हजार बीस
तै है बै छू हमुकै भौत रीस
यौ साल कोरोना काव लैगो
सबुकै मुखम मुहाव लगैगो
मास्क पैरने कान म हैगे पीङ
जल्दी जा रे द्वी हजार बीस.....
जिंदगी कटंण लै रै रुनै रुनै
रोज साबुन ल हाथ धुनै धुनै
पत्त नै कब मिलैल वैक्सीन
जल्दी जा रे द्वी हजार बीस.....
हरयाव, जन्माष्टमी, दसरा, दिवाई
एक लै त्यार भलिकै नि मनाई
मन में रैगे त्यार मनाणं टीस
जल्दी जा रे द्वी हजार बीस.....
पढाई लिखाई सब चौपट करगो
मोबैल में को आपुण खौर पढछौं
बेकार न्हैगै यौ साल क फीस
जल्दी जा रे द्वी हजार बीस.....
ब्या ती हयी पर झरपर नी हय
पचास बरेती पचास घरेती हय
फैमिली फोटू में लै नि हय भीङ
जल्दी जा रे द्वी हजार बीस.....
घुमंण फिरंण सब बंद करैगो
यौ साल सबुकि म्वाव लगैगो
अब देखो धैं के करौं इक्कीस
जल्दी जा रे द्वी हजार बीस.....
दीपक चन्द्र सनवाल, पहाड़ी 'दीप', वड़ोदरा, December 27, 2020

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