
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
उज्याव देखि बेरि
अन्यार 'कि ले
हा्व मुचि जैं ....
शिबौ ! मनखी
झसझसाटै में
मर।
.............
तु भयी
और
मूँ ले भयूँ
मगर ....
दुन्नी
ततुकै जि भै।
............
देखँण-चाँण में
टैक्स जि लागों ....
तु ....
गगैरि
छलकण जाँणैं
देखनै कन।
............
दुहैरि
जन्मणिं
कैल देखि राखी ....
तु
"घोल" है
भ्यार रयी कर।
............
साँचि कूँण रयूँ
चा्ड़-प्वाधनां वीले
मैं ज्यूँन भयूँ....
नन्तरी
शहरन में को कै
"धाल लगूँ" कूँछा।
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तलि
मलि में
पप्पुवै-ई
धाल नि लगूँन ....
अच्छयान
मिस-काल करैं...
बाबू
कटकी रुँनीं या
कत्थप
ध्यान लगै राख्नीं...
और नान्तिन
बलान न्हाँतिन
फिर ले
बखत
काँ थामीनेर भै...
जिन्दगी में
सब है बेरि ले
कू नि भै कूँछा...
पत्त नै
ततु ठुलि बात
को कै ग्यो हुन्योल।
..............
पटाँङण
नि भये त
छत मैयी सई ...
चा्ड़-प्वाथ
ऐयी जनेर भै
शहरन में ले.. ...
आ्ब
गौंन जस
यैयी एक बचि रौ ...
मैं
रत्तै ब्याँण
दा्ँण - बीं छितरै ऊँ
"त्यार लिजी" ले ।
..............
बखत पर
घाम नि ऐ त
घमाघम'लि
के करुँन ....
मुट्ठी भरी
उज्यावै लिजी
मैं ...
नींन नि ऐ
और
तु ले
नि ऐयी ...
मगर
उज्याव ल्ही बेरि
क्वे त आलै सई ....
मैं
पक्क भरौस छ।
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शब्दार्थ:-
हाव मुचण - डरना,
झसझसाट - अनिश्चितता,
ततुकै जि भै - इतनी ही थोड़ी है यानी और भी है।,
देखनै कन - देखते क्यों नहीं,
दुहेरि जन्मैणि - दूसरा जन्म,
को कै - कौन किसको,
धाल लगूँ - आवाज देना
Dec 21,24 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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