
भाग और करम
रचनाकार: हीरा बल्लभ पाठक
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भाग और करम
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ज्ये ल्येखी छू भाग में, ऊ त् भोगणैं पड़ौल्
वी हिसाबैल् करम लै, हमूकैं करणैं पड़ौल्।
सुद्दै क्वे रज नि बणौंन्, करम त् सब्बै करनीं
भिखारि हुणां ल्हिजी लै, करम करणैं पड़नीं।
जैक् भाग वीक् भोग, गुणी लोग यौ ई कूनीं
भैट्-भैटै भाग नि फलौ, करम करणैं पड़ौल्।
करम करंण जिन्नगी छू, भोग छू भागै बात
लॉटरी टिकट ल्ही बेर्, रिजल्ट द्येखणैं पड़ौल्।
लॉटरी टिकट करम छू, दौं लागण भागै बात
भाग लै तब्बै जागल् , करम हौल् जब सार्थक।
युधिष्ठिर क्ये भल् मैंस, जिन्नगी भरि करमैं कर
दुर्योधन खै गो माछ, भागक् कारण बंणि रौ रज।
करम वील् लै कर, भले ही छल- कपट दगड़
क्ये ल्हिगो अपंण ल्हिजी, अपजसक् टुपर भर।
भाग भोगन्ति करम करन्ति,येसि लै कहावत भै
करम है मुख नि मोड़ण, भाग हमर दगड़ै रौल्।
निछु भागपार् फिकर निकर, ज्ये छू ऊ में खुशि
करम हम जस् करूल्, उस्सै आघिल् भोगण पड़ौल।
(राजा युधिष्ठिर द्यूतक्रीड़ा में इतने निपुण थे कि उस काल में कोई भी व्यक्ति उन्हें पराजित नहीं कर सकता था, परन्तु उनके भाग्य में राज सुख था ही नहीं। कपटी शकुनि ने ऐसा जाल फैलाया कि उन्हें वन-वन भटकने को बाध्य होना पड़ा। भगवान् श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी, किन्तु कैकयी को माध्यम बनाकर भाग्य ने ऐसी करवट ली कि वे भी चौदह वर्ष वनवास भोगने को बाध्य हुए और उसके पश्चात राजगद्दी पर बैठै तो सही परन्तु राज्यसुख से फिर भी वंचित ही रहे।)
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हीरावल्लभ पाठक (निर्मल), 05-03-2021
स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर,रामनगर
हीरा बल्लभ पाठक जी द्वारा फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी पर पोस्ट
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