कोरोनाक दिन

कुमाऊँनी भाषा में लेख- कोरोनाक दिन, article in Kumaoni language Covid pandemic period and Kumaoni society, Kumaoni Lekh

कोरोनाक दिन

लेखक: केशरसिंह डंग्सेरा

द्वाराहाट बटि पश्चिम दिशा हणि 10 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी छू जैक तिराइ चारों दिशाओं में चार गौं बसी छें।  हर गौं में लगभग सौ-सौ मवाॅस रनी। पहाड़ी में दश-पन्दर दुकान, इण्टर कौलेज, प्रायमरी पाठशाला, पोस्ट औफिस, दूदकि डेरी आदि छैं। लाकडाउनक टैंम पर हर गौंक द्वी-द्वी, चार-चार लोग गों-घरों में ऐ रई। वजारक एक दुकान चार-पाॅच लोग भै रई। एक गों बटि एक स्येंणि लै दुकान में ऐंछ और केंछ- 

यों देशन बटि घरूं हणि आण लैगीं। तुम इनूकणि घर किलै आण दिमछा। यों इपन वाॅ कणि लै बीमारी सरेंल।  देशन जहाणी इनूकणि फौरी बाधोव लाग, घर कुड़ि बज्यै बेर न्है गाय। आज चैन हैगोछौ इनूकणि घर ?पुराण लोग कॅछी तलि हणि नि सरन यों तलि हणि गाय। याॅ लै मोलै खाण हय वाॅ लै मोलै खाण हय कॅछी। आज इनूकणि देशनक खहाणि निपचन है गन्हलौ?

दुकान में बैठी एक मैंसल जबाब देछ- वूॅ आपण घर आण लै रई काखी ! हम उनूहाणि न आवो जै के कै सकनू।  जैल पहाड़क गौंनू में मकान ठिक-ठाक बनै रई वीं आनी, जैक कुड़ खानर है गई वूॅ त देशन और लै परेशान छैं। गोंनू वाव सोचण लैरी देशन बै आइयाॅ हैबेर बचुल, जो देशन छैं, वूॅ सोचण लैरी पहाड़ जैबेर बचुल।

सब आपणि-आपणि फिकर में छैं कि कथें हाम जै कोरोनाक चपेट में न ऐ जों। छोटि-मोटि नौकरी और मजदूरी करि बेर पेट पावणियाॅक मैं गाड़-मैं गाड़ हैरै। जेब में पैंस नहैं भतेर राशन, सागपात नहैं भ्यार जाण नहैं, ऐगो पिनकटिक मरण। दुनी में लाखों मनखी मरिगो, लाखों कोरोनाल बीमार छैं। हमर देश में लै रोज बीमारोंकि अनाधुन बढ़ोत्तरी हण लैरै आजि बीमारी जाणि कभणि तक रेंछ। दश साल तक लै रै सकींछ। य बीमारी आॅखाॅ बाट लै सरी, साॅसल लै, खाॅसल लै, दगड़ै रणल लै, हाथ मिलाणल लै।

तबै हिन्दू धरम में नमस्ते चली छी। वानप्रस्थ, सन्यासक विधान छी, मांस भक्षण निषेध छी। जीवूॅ पर दया करछी, बाघ-बाकर दगड़ै पाणि पिंछी, जप-तप करछी, जौ-तिल-घ्योंक होम करछी, जैल वातावरण लै शुद्ध रोंछी।  आफी रोगक बचाव है जाॅछी। देशन बटि आइयाॅ हैबेर में दूर-दूर रयै काखी ! यै यैक बचाव छू बस।
 
पुराण बुड़बाड़ि बताॅछी कि लगभग 100 साल पैली एक बखत पहाड़ में हैज हौछ बल। लोग आपण घरक बीमारों कणि छोड़ि बेर गध्याराॅ पन, उड्यारों पन, कें दूर खेतों में  छप्पर बनै बेर रई बल। रात हणि सानीसानि ऐ बेर गों पन बटि गदू-लौकि , चिचन-त्वर्याॅ, घ्वाग-काकड़ टोड़ि  लिजाॅछि। ग्यों भट भुटि बेर क्वरै गल्याॅछी।  जो हैजक बीमार मरि गया उनूकड़ि घरक नजीक बाड़-ख्वड़ाॅ में खड्यै दिंछी। क्वे कैहणि बुलाछी लै नै। जब हैजकि बीमारीक थिरथाम हौछ तब आपण गों-घरों में आई। तहैं लै गोंनुकि आबादी आदुक है गोछी बल।

प्रकृति हणि क्वे नि जितन चाहे क्वे कतुै जोर लगै  लियो। आ्ब आज देखो भौत देशोंल अणुबम बनै हैलीं। जब कैदिन उनूमें आफी विस्फोट हैजाॅ। तहें नि मरलौ मनखी और जीव-जन्तु। कम्पनि खोलुल कबेर सब सोचनी गैस रिसाव है जा्ल कबेर जै के सोचनी। गैस रिसि गई भोतै प्राणी मरि 

जानी। मनखी आपणि जोतो जिबाइन आफी फॅसि जाॅ।  विज्ञानल विनाश लै हैजाॅ। जानवर उज्याड़ खैदयों कबेर उनर गिच पर मुहाव लगानी आज मनखियक गिच पर मुहाव  लैरो, कतनि अणहोति हैरै ? आब घरों में क्वड़म जस भैटी रौल मनखी। जिन्दगी निसिरि हैगे।
आब ऐ गई मनखियक मुहाव लगाणी दिन। 
मनखी कणि भुकतिस घरों में गोठयाणी दिन। 
करोड़ो मनखियोंक नौकरी छुटाणी दिन। 
परदेश बटि फजित है आपणि थातम आणी दिन। 
आजि एै गई गध्यार और उड्यारों में रणी दिन।
बेंडु-तिमिल, हिसाउ-किल्मौंड़, गेठि-क्याव खाणी दिन।
तितिर-च्याखुड़, ग्याॅज-गढ़्यर, माॅछा कित चाणी दिन।
ग्यों-भट भुटि बेर क्वरै गल्याणी दिन।
आजि ऐ गई बुढ़-बाड़िक सन्यास पर जाणी दिन।
जमान कणि दश-बीस साल पछिन कै लिजाणी दिन। 

चमड़ूचड़, गौल-स्याप, मिनुक-छिपाड़ खानी यों।  
गोरु-भैंस-ऊॅट भौतै जीवों कें कटानी यों।  
ऐटम बम विनाशक मिसाइल बनानी यों।  
लाइलाज बीमारियोंल दुनी कें हलकानी यों।  
आपण दगड़ दैज में औरों कणि लिजानी यों।  
मैं ठुल मैं ठुल कनें दुनी उजड़ानी यों।  
आपण हातल आपण लिजी खड्यर लै बनानी यों। 
 दुनी में नई-नई विषाणु कैं फैलानी यों। 
यक्कै बात बाकि रैगे विश्वयुद्ध करानी यों। 

केशरसिंह डंग्सेरा बिष्ट, तकुल्टी, द्वाराहाट 
(केशरसिंह डंगसेरा बिष्ट जमीन से जुड़े जन्मजात कवि हैं। उनकी लेखन शैली और  वाक्य विन्यास उन्हें एक शीर्षस्थ साहित्यकार की श्रेणी में स्थापित करते हैं। ‘हरूहीत  मालू’ खण्ड काव्य उनकी काव्य प्रतिभा का एक श्रेष्ठ उदाहरण हैं) -सम्पादक कुमगढ़
उत्तराखण्डी मासिक: कुमगढ़ 18 वर्ष 07 अंक 1-2 मई-जून 2020 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ