सिटौव, कौअ और घुघुति

कुमाऊँनी कविता-सिटौव, कौअ और घुघुति-Kumauni Kavita, Ghuguti, Sintola,Kale Kaua

-:सिटौव, कौअ और घुघुति:-

लेखिका: अरुण प्रभा पंत

मैं आपण आंगण ठाड़ मल्कै चांणयुं
अनार तिमिला'क बोटन भै चाड़ै चाड़
उथकै सबनहै अलग कौ वैक कां कां
भिड़पन रिश्याबै भाता'क सित खित
मुणी नाजा'क दाण छिटकै बेर फोकीं
झप्प म्योर पुरआंगण भरिगो चाड़नैल
रोजौ'क म्योर काम चाड़'क दर्शन भै 
क्वे चौड़ नि दिखीण मैं हैजां निसासी
यौ चाड़, कुकुर गोर-बाछ म्यार दगड़ू
कभै पुर परवार, त्यार ब्यारै'क धूम हुंछी
हर बखत सगड़ मेंआग, चहलपहल भै
मैं सोचन छ्युं कब मिलैल मकं संच
इतु ठुल कारबार इताण ठुल परवार
खोर कन्यूंणैक फुर्सत नै बस कामै काम
सयाणनै'क डांठ, नानतिनौ'क उजाड़
कब दिन भौं कब भै सांझ के पत्त नै
आब चानू तो क्वे न्हां रोकण टोकणी
करुंतो काम निकरूं तो गोरुक ड्वां
यो चाड़ यो गोरबाछ निहुना तो के हुन अलीत,
मैं पड़ र् यून्यू या लुली रुन्यू
यो देई मैंल पहरै राखी पत्त नै कंजांलै कब-तक।

मौलिक
अरुण प्रभा पंत 

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