
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
तु
आ त सई
उज्याव
है जनेर छ।
पुलम
अलबखर
आजि ले फवनीं
मोव थैं, मगर
खानेर .....
क्वे न्हाँ।
सड़क
कि पुजी मोव थैं
निस्वास
ज्यादे लागण भैगो।
तु नि सई
क्वे त
फर्कलै सई ....
मोटर
खालि नि जानि
याँ बटी
ल्ही जाली त
" वाँ " बटी ले
लाली सई।
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मैं
पक्क भरौस छ
कि, जब तुम आला
उज्या्व
है जनेर छ
बखत ले
थामीनेर छ
घोड़ी लगाम जस ...
थ्वाड़ै देरा लिजी सई
आँखन में
छिलुक उज्या्व ले
हुनेर छ ......
तब
मूँ ले
अन्यारि दुन्नी कैं
तु्मा्र उज्या्व में ले
भली कै देखि सकूँन .....
दिगौलालि !
न्यारी देखी रै हो
यो दुन्नी आज ......
कौव
रत्तै ब्याँण कै जैरौ
तुम छुट्टी
ऊण लागि रौछा बल .....
जरुर ऐ दिया हाँ
आ्ब .......
पहाड़ जा्स दिन
धो काटण है रयीं
ऐकलै
सूर्ज'क
उज्या्व में ले।
शब्दार्थ:
फवनी ---- फलते हैं
खानेर -- खाने वाला
फर्कलै -- लौटेगा
लाली -- लायेगी
मूँ --- मैं
May 20/24, 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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