
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
सातूं अध्याय (श्लोक सं. ११ बटि २० तक)
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।११।।
ये चैन सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।।१२।।
कुमाऊँनी:
भगवान् ज्यु कुनई कि- मैं बलवानों क् कामना और इच्छा रहित बल छूं, और जो धर्मविरुद्ध न्हैं ऊ काम लै मैं ई छूं । हे अर्जुन! तुम यौ ज्याणि लियौ कि सत, रज, तम यौं सब्बै गुण मेरी शक्ति द्वारा जरूर उत्पन्न छन् पर मिकैं नि व्यापन् । मैं स्वयं इनूं में लिप्त नि हुंन और स्वतंत्र रूनूं ।
( इन श्लोकनोंक अर्थ पढ़ि बेर एक शंका हैं कि कामना रहित बल और जो धर्म विरुद्ध न्हैं ऊ काम क्ये छू? कैकैं हानि पहुंचायी बगैर बलौक् प्रयोग जैल् समाजौक् हित है सकूँ ऊ कामना रहित बल छू और मात्र सीमित वंश वृद्धिक् ल्हिजी सिर्फ सन्तानोत्पति लक्ष्य छू त् ऊ काम लै धर्म सम्मत छू यौस् ज्ञानी लोग लै कूनीं और भगवान् ज्यु लै कुनयी । अर्थात् प्रत्येक ऊ कर्म जै में समाज, प्राणिमात्र, जड़, चेतन और स्वयं इन सब्बूकै यानि कि समस्त प्रकृतिक् हित समाहित छू ऊ ई कार्य धर्म सम्मत है सकनीं।)
हिन्दी= मैं बलवानों का कामनाओं और इच्छा से रहित बल हूँ और हे अर्जुन! जो धर्म विरुद्ध नहीं है, वह काम भी मैं ही हूँ । तुम जान लो कि सारे गुण सत, रज तम मेरी ही शक्ति द्वारा उत्पन्न होते हैं, किन्तु मैं इन गुणों में लिप्त नहीं होता अपितु स्वतंत्र रहता हूँ।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।।१३।।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।१४।।
कुमाऊँनी:
प्रकृतिक् तीन गुण सत्, रज और तम छीं, प्रत्येक जीव इनन् है अलग नि है सकोंन् और इनार् वशीभूत हैबेर् ऊ सबकुछ ज्याणते हुए लै भगवान् ज्यु कैं बिसरि जां, किलैकि ऊ संसारी सुख ( जो वास्तव में सुख छु ई नै) कैं सर्वोपरि मानि बेर् असल् सुख (भगवान् ज्यु) कैं भुलि जां, परन्तु भगवान् ज्यु कुनई कि जो मेरि शरण में लौलीन है जां और संसारी सुखों कि चपेट मे नि ऊंन् ऊ भौत्तै आसानील् मिं तक पहोंचि सकूँ ।
( अर्थात्- तुलसीदास ज्यू कुनई कि, "कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।" यैक् अनुसार यज्ञ, जप, तप, योगसाधना आदि जो नि करि सकौंन् त् वीकैं निराश हुंणैंकि लै जरुरत न्हैं, सिर्फ मन में सच्ची पीड़ हुंण चैं
और शारीरिक/मानसिक रूपैल् निर्मल हुंण चैं । भगवान् ज्यु हरदम हमर् दगड़, हमर् सामंणी और हमर् हृदय में ई रूनीं)
हिन्दी= सत्, रज, तम इन तीनों गुणों के द्वारा मोहग्रस्त यह संसार मुझ गुणातीत, अविनाशी को नहीं जानता। प्रकृति के तीन गुणों वाली मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना बहुत कठिन है, किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे सरलतापूर्वक इसे पार कर जाते हैं।
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
मामयापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।१५।।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।१६।।
कुमाऊँनी:
जो निरपट्टै मूर्ख छन्, जनौर् ज्ञान माया द्वारा हरि हैलौ, और जो आसुरी व्यौहार करनीं यस् दुष्ट लोग मेरि शरण में नि ऊंण चान्। हे अर्जुन! चार प्रकारक् पुण्यात्मा मेरि सेवा में लागी रूनीं ऊ छीं- पीड़ित (दुःखी) छन् , जो ज्ञानक् रस्त पार् चलंण चांनी, जो पुण्य करि बेर् पुण्य लाभै कि कामना करनीं और जो प्रत्येक विषय कैं भलिभांति ज्यांणनी।
( हमर् समाजक् वास्तविक विद्वान् जस् कि - ब्रह्मा, शिव, कपिलमुनि, अश्विनिकुमार, मनु, व्यास, देवल, जनक, प्रह्लाद, बलि तथा उनर् बाद माधवाचार्य, रामानुजाचार्य, श्रीचैतन्यप्रभु तथा और लै भौत्तै विद्वानुल् भगवानैकि शरणागति स्वीकार करी। यैक् विपरीत कुछ लोग ज्ञानी , विज्ञानी, शिक्षक या धर्मगुरु बणि बेर् सिर्फ अपंण हित साधणाक् ल्हिजी आडम्बर करनीं, डबल कमौनी यस लोग कभ्भीं लै भगवान् कैं न त् समजि सकंन और न समजै सकन् । ऊं त् स्वयम्भू बणि बेर् अपुंण अलगै सत्ता स्थापित करि दिनी और आपूं कैं पुजवानी? जो उनार् ल्हिजी लै और उनार् अनुयायियों क् ल्हिजी लै कत्तई भल् न्हैं)
हिन्दी= जो निपट मूर्ख हैं, जो मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है तथा जो असुरों की नास्तिक प्रकृति को धारण करनेवाले हैं ऐसे दुष्ट मेरी शरण ग्रहण नहीं करते। हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी सेवा करते हैं वो हैं- आर्त (पीड़ित), जिज्ञासु (ज्ञान के लिये उत्सुक), अर्थार्थी (लाभ की इच्छा रखनेवाले), तथा ज्ञानी (विषयवस्तु को सही रूप से जाननेवाले)।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।१७।।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।१८।।
कुमाऊँनी:
जो परम ज्ञानी छन् और शुद्ध भक्ति में लागी रूनीं ऊं सबन् है श्रेष्ठ छन्। यस् उदार हृदय मनखि मिकैं और मैं वीकैं भौत्तै भल् माननूं । यस् मनखि मेरि दिव्य सेवा करिबेर् मैं जो सबन् है ठुल् उद्येष्य छू वीकैं निश्चित रूपैल् प्राप्त करूँ ।
( अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि भक्तगण हमेशा म्यर् हृदय में वास करनीं और मीं उनार् हृदय में वास करनूं । म्यर् भक्त म्यर् अलावा कै कैं नि ज्याणन् और मैं अपुंण भक्तूं कैं कभ्भीं लै नि भुलन् । यस् भक्त हुणां ल्हिजी संसारिक भोगूंक् त्याग आवश्यक छू । जो यौ रस्त पार् वस एकबारी चलंण भै जां त् फिरि वीकैं दुहर् प्रलोभन अपणि तरफ नि ल्हि जै सकन् और ऊ म्यर् तथा मीं वीक् है जनूं- तुम बिन हमरी कौन खबर ले, गोवर्धन गिरिधारी, यौ वाई स्थिति हुंण चैं तब समजो कि भव पार् करंण में देर नि हुंनि।)
हिन्दी= जो परमज्ञानी है और शुद्ध भक्ति में लगा रहता है, वह सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मैं उसे और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। निःसन्देह ये सब उदारचेत्ता व्यक्ति हैं, जो मेरे ज्ञान को प्राप्त हैं उसे मैं अपने ही समान मानता हूँ । वह मेरी दिव्य सेवा में तत्पर रहकर मुझ सर्वोच्च उद्येष्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।१९।।
कामस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।।२०।।
कुमाऊँनी:
अनेक जन्मूं बाद अभ्यास करन करनैं जै कैं सच्ची में ज्ञान प्राप्त है जां , ऊ मिकैं सब्बै कारणुंक् कारण ज्याणि बेर् मेरि शरण में ऐ जां, और जनरि बुद्धि संसाराक् चमक - दमक द्वारा हरण है जैं, ऊं इन्द्र, कुबेर, शनि आदि द्यापतोंकि शरण में जनीं और अपुंण-अपुंण स्वभाव अनुसार उनरि पुज करनीं।
(अर्थात् जो कयेक जन्मूं कि तपस्या बाद फिरि मनखि जून में ऊं और यौ समजि जां कि भगवान् है अलावा क्वे लै दुहरि शक्ति भवसागर है पार् नि करै सकनि, और यौ संसाराक् हर्ता - कर्ता स्वयं भगवान् कृष्णज्यु छीं, ऊ तब स्वेच्छाल् मेरि शरण में ऊंछ और सुख भोगूं। जनरि मति संसारिक भोगूंक् लालची है जैं, ऊं भांति भांतिक् द्याप्तू कैं पुजनी और क्षणिक लाभ ल्हि बेर् खुशि रूनीं, द्याप्तनैकि अपणि-अपणि सीमा हुंनी और ऊं टिकाऊ लाभ द्यण में समर्थ नि हुंन, किलैकि उनरि पास जो लै शक्ति या साधन छीं ऊं लै म्यर् दियी हुई छन्।)
हिन्दी= अनेक जन्मजन्मान्तरों के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है, वह मुझको समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है। जिनकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं द्वारा मारी गयी है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं और वे अपने-अपने स्वभाव के अनुसार उन देवताओं की पूजा करते हैं।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
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