ग्वाई और सिपाई
रचनाकार: चन्दन रावत
(गीत)
मित्रो मेरा ये युगलगीत भी 1973 में एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।
सोचा आपके साथ शेयर कर लूं।
सिपाई-कोछै तु पारै ढई, कतीकी छै बता ग्वाई।
म्यर पटीमें त्यर गोरु किलै आई ये।
त्येरी रहपोट मैल नी कराई ये।।
ग्वाई-तू कोछै पारै भ्यट, हात पारी बड़े लट्ठ।
तु कोहछैं पुछणी, मैं द्यूंला गाई रे।
म्यर गोरु त्यर उज्याड़ में नी आई रे।।
सिपाई-हामरौ खवाय उज्याड़, हमूं हैती तकराड़।
कसी बात बने त्वील हायी हायी ये।
त्येरी जसी मैंल नी देखी ग्वाई ये।।
ग्वाई-चुपैजा तु न खा कान, बड़ै दिखाण लैरो शान।
म्यर गोरु छी तपड़ में तिराई रे।
गोरु नी अय पटौ में निसाई रे।।
सिपाई-मैं चौकदार कैं बुलानू त्येरी रहपोट करानू।
त्यर गोरु कैं लिजानू मैं हकाई ए।
म्यर पटौमें त्विल गोरु किलै चराई ये।।
ग्वाई-बुलैल्या तु चौकदार आपण गौंक थोकदार।
देखुल को करौंछ त्येरी सुणाई रे।
जा जा जोड़ि ले तु द्वी-चार गवाही रे।।
सिपाई-खोली बै सुण कान रुपैं बीस हैल जुर्मान।
पजै झन दियै मकणी तू गाई ये।
सुण नौ छू म्यर भीम सिंह सिपाई ये।।
ग्वाई-मैंलै छौं पधानै च्येली म्यर नाम छु रुपुली।
ज्यादा बात नी बना मैं द्यूला गाई रे।।
त्यर पटोमें मैंल गोरु नी चराई रे।।
सिपाई-ओ भागी मैं छी अनजान त्यरा बोज्यू छैं पधान।
उँ हणी छैं म्यर सौर मैं जवाई।
भगवानैल हम याँ कस मिलाई ये।।
ग्वाई-मकैं माफ करी दीया मनमा झन धरिया।
मैं नी जाणों छी तुम छा म्यर सिपाई हो।
मैं नी दीछी तुमु कणी एसी गाई हो।।
सिपाई-तहां पली बतै दीनी एतुक बात नी बनानी।
मैं नी जाणोंछी म्येरी रुपुली छू ग्वाई ये।
आज क्ये भल मानी मौंछ य ढई ये।।
ग्वाई-कसी ठंडी चली रे पुरवाई हो।।
सिपाई-आ स्यो भैजोंला आमै की डाई हो।


चन्दन रावत जी की फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी शब्द सम्पदा पर पोस्ट से साभार
फोटो सोर्स गूगल

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