खतड़ुवा- कुमाऊं का विजयोत्सव

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खतड़ुवा- कुमाऊं का विजयोत्सव

लेखक: नीरज चन्द्र जोशी

खतड़ुवा, कुमाऊं का विजयोत्सव माना जाने वाला यह त्यौहार वर्षाकाल की समाप्ति और शरद ऋतु के प्रारंभ में कन्या संक्रांति के दिन आश्विन माह की प्रथमा तिथि को हर्षोल्लास से मनाया जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर डीडी शर्मा की पुस्तक उत्तराखंड ज्ञानकोष के अनुसार यह कुमाऊँनी सेना की उस विजय का स्मारक है जो कि उसने गढ़वाल की सेना पर प्राप्त की थी। इस युद्ध में कुमाऊँनी सेना का नेतृत्व गैड़ा सिंह और गढ़वाली सेना का नेतृत्व खतड़ सिंह कर रहा था। इसमें खतड़ सिंह की पराजय हुई थी।

ब्रिटिश इतिहासकार एटकिंशन और प्रोफसर डॉक्टर मदन चंद्र भट्ट के अनुसार यह युद्ध चम्पावत के राजा रुद्रचन्द के पुत्र लक्ष्मण चन्द और गढ़वाल के शासक मानशाह की सेनाओं के बीच 1608 ई. हुआ था। इससे संबंधित लोक गीत निम्न है-
"भेल्लो जी भेल्लो।
गैड़ा की जीत खतड़ुवा की हार।
भाजो खतड़ुवा धारे धार।
गैड़ा पड़ो श्योव खतड़ुवा पड़ो भ्योव।।"

इस त्यौहार के दिन गांवों में लोग अपने पशुओं के गोठ को विशेष रूप से साफ करते हैं। पशुओं को नहला-धुला कर उनकी खास सफाई की जाती है और उन्हें पकवान बनाकर खिलाया जाता है। पशुओं के गोठ में मुलायम घास बिखेर दी जाती है। शीत ऋतु में हरे घास का अभाव हो जाता है, इसलिये “खतड़ुवा” के दिन पशुओं को भरपेट हरा घास खिलाया जाता है। शाम के समय घर की महिलाएं खतड़ुवा (एक छोटी मशाल) जलाकर उससे गौशाला के अन्दर लगे मकड़ी के जाले वगैरह साफ करती हैं और पूरी गौशाला के अन्दर इस मशाल (खतड़ुवा) को बार-बार घुमाया जाता है और भगवान से कामना की जाती है कि वो इन पशुओं को दुख- रोग, शोक से सदैव दूर रखें।

गांव के बच्चे किसी चौराहे पर जलाने लायक लकड़ियों का एक बड़ा ढेर लगाते हैं। गौशाला के अन्दर से मशाल लेकर महिलाएं चौराहे पर पहुंचती हैं और इस लकड़ियों के ढेर में “खतड़ुआ” समर्पित किये जाते हैं। ढेर को पशुओं को लगने वाली बिमारियों का प्रतीक मानकर “बुढी” जलायी जाती है. यह “बुढी” गाय-भैंस और बैल जैसे पशुओं को लगने वाली बीमारियों का प्रतीक मानी जाती है। जिनमें खुरपका और मुंहपका रोग मुख्य हैं। इस चौराहे या ऊंची जगह पर आकर सभी खतड़ुआ जलती बुढी में डाल दिये जाते हैं।

इस अवसर पर हल्का-फुल्का आमोद-प्रमोद होता है और ककड़ी को प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। इस तरह से यह त्यौहार पशुधन को स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट बनाये रखने की कामना के साथ समाप्त होता है लेकिन आज यह प्रथा विलुप्ति की ओर है।

अंत में सभी को खतड़ुवा पर्व की हार्दिक बधाई।

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