
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
जिम कार्बेट पार्काक शेर ..... 😁😁😁😁
यो मैलि एक आदरणीय विद्वान ज्यून 'कि आज रत्तै 'कि पोस्ट बटी प्रेरणा और प्रेरित है बेरि लेखि राखीं। के गलती छै त यै लिजी उयीं दोषी छन्। कूँण - नकूँण जे चाँछा , सब उननै थैं कया और खूब कया ....... नमस्कार । नौ धरण में जा्ँठ ल्ही बेरि ऐ पुजा्ल ... डर ले लागै कूँछा।
जस-जस
बुणींड़ रयूँ
स्यैंणि
टर - टर हुँण लागि रै।
............
धोति - बिलौज में
यो हाल छन त
सुर्याव - सूट में बुड़ी
जे धैं करें हो ।
...............
आई लब यू ....
के - कै बैठियूँ
स्यैंणिल
" पासवर्ड " छड़ै ल्हे ।
....................
बुड़
बुड़ि
किनमड़ 'कि
झेड़ि .....
हिसालु त्वा्प
भुलि जा
काफल खाँछै
दाँत लगा .... ।
................
जाँण'किै बात में
तय है रौ .....
मैं केय मरूँ --
पैलीं तुम मरौ ।
.................
जब
कभै
" लब बात " करौ
स्यैंणि कूँछ .....
तुमा्र ख्वा्र
बज्जर पड़ौ ।
..................
बखता !
तेरि बलै ल्हियूँन
बुड़-बल्द ले
अच्छयान
"हव-लगूँण"
है रयीं।
-----------------------------------------------
जुनालि रात में
के कूँ भागी ...
बस
योयी समझ के
"मुची-बखत"
कभै पल्टन न्हाँ।
..............
अनया्र रात में
तु उज्या्व भयी
कभै जैंङिणी त
कभै छिलुक भयी ।
.................
" सीमा " त
म्या्र लिजी भै
त्या्र लिजी
के~ नि भै!
..........
सोचूँ .....
जैल सीमा बणैं
उ रानौ
कस हुन्योल कै।
...........
सीमा मतलब
स्यैंणि
और मैंस
द्वियै भ्या क्या्प।
............
छिलुक जाँणै त
समायि सकीं
"द्या्याव" समावण
मेरि बसै बात नि भै।
शब्दार्थ:
बुड़ीण - बूढा होना,
टर टर - स्मार्ट वाचाल,
सूर्याव - सलवार,
झेड़ि - झाड़ी,
हव लगूँण - जवान होना......
मुची बखत - बीता समय,
पल्टन - लौटता,
समायि - संभालना,
द्या्याव - चीड़ का बूटा जिसे फाड़ कर छिलुक बनते हैं।
शब्दार्थ कुछ अलग भी हो सकते हैं लेकिन मंशा गलत नहीं है।
July 19,20, 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
ज्ञान पंत जी के फ़ेसबुक प्रोफ़ाईल पर जा सकते हैं
0 टिप्पणियाँ