
वी पधान वी हुस्यार
रचनाकार: हीरा बल्लभ पाठक
दूध-भात खैबेर् भागी,
नानतिन हुन्छी खूब हुस्यार।
आब खांण भेगी मैगी-बर्गर,
तबेत रूनी हरदम बीमार।१।
भटै रांजणि झ़ुंगरौ भात,
ब्वझ उठै द्यछीं बातै-बात।
अच्याला नान् फूल जस् परांण,
हिटि नि सकंन् द्वी लपाक्।२।
आठ-दस मैल् पैदल् जंछी,
तब पड़छी इस्कूल,
आब् त् ऑनलाइन हैगो,
ठंड-ठंड कूल-कूल।३।
शराब गुटुक बाट-बाटन् में,
इफरात है रै कूंछा,
संस्कार त् हरै गयीं भगवान् ज्यु ,
तुम क्यलै चुपै रोछा।४।
एक बखत् ऊ लै छी,
जब भल् मनखिकि हैंछी कदर,
आब् जैक् छीं चार चाटुकार,
वी पधान वी हुस्यार।५।
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हीरावल्लभ पाठक (निर्मल), 21-07-2020
स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर,रामनगर
हीरा बल्लभ पाठक जी द्वारा फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी पर पोस्ट
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