पशुओं का त्यौहार: खतडुवा

कुमाऊँनी लोकपर्व खतडु़वा, आश्विन (अशौज) मास के पहले गते को मनाया जाने वालापशुओं का त्यौहार है। Kumaoni festival Khataruva celebrated on 1st day of Ashvin month of Indian Calendar.

पशुओं का त्यौहार: खतडुवा
लेखक: श्याम जोशी

आश्विन के पहले गते को कुमाऊँ में मनाया जाने वाला खतडुवा भी पशुओं का त्यौहार है। इस दिन गाँव के सभी घरों में भांग की डंडी पर काँस (घास) व फूल आदि लगाये जाते हैं। सायं सभी घरों के लोग चिराग जलाकर भाँग की फूल व काँस लगी इस डंडी को गाय के गोठ (गोशाला) ले जाते हैं। सभी जानवरों को उस आग से झाड़कर भाँग की उस डंडी व आग को गाँव के चौबाटे (जहाँ से चारों ओर रास्ते हों) में ले जाते हैं। चौबाटे में गाँव के सभी लोग अपने घरों से पीरूल सहित पहुँचते हैं। उस चौबाटे में थोड़ी देर काफी चहल-पहल रहती है। अपने-अपने घर से ले गये जले हुए चिराग से सबसे पहले पीरूल पर आग लगाने की होड़ रहती है।

अधिकतर गाँवों में बच्चे दिन से ही चौबाटे में लकड़ी के मोटे डंडे गेंठकर ऊँची चट्टान सी पीरूल से बनाते हैं। चौबाटे में आग जलाकर लोग खुश होते हैं। उस जले हुए आग को खतड़ुवा कहा जाता है। घर से ककड़ी ले जाते हैं। पहले ककड़ी खतडुवा को चढ़ाते हैं फिर ककड़ी के बीज की बिन्दी माथे पर लगाते हैं।

खतडुवा जलाकर बच्चे चिल्लाते हैं। जानवरों की खाज खुजली न होने की कामना करते हैं। बच्चे दूसरे गाँव के मुखिया को खुजली होने की बद्दुआ देते हैं। सारा खतडुवा यानी पूरा पिरूल जल जाने पर सभी लोग चिराग से उस आग को अपने-अपने घरों में ले जाते हैं। घर के सभी लोग उस आग को सेकते हैं। माना जाता है कि इस आग को सेंकने से खाज-खुजली नहीं होती है।

पहले पहल सारे गाँव के लोग गाँव के एक ही स्थान पर सामूहिक रूप से खतडुवा जलाते थे। कई गाँवों में लोग बाकायदा बाजे-गाजे के साथ सामूहिक रूप से चौबाटे तक जाते थे। अब गाँवों में पहले जैसा प्रेम नहीं रहा।


श्याम जोशी अल्मोड़ा

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