पलायन - कुमाऊँनी कविता

कुमाऊँनी कविता “पलायन“ नौकरी भैर सुविधा भैर, यांक गौं में लागिगे डायन।  वीक बाद लै सब्बै कुंणईं, पहाड़ पन किलै छू पलायन। Kumaoni Poem about migration from hills

 “पलायन“
(रचनाकार: उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम")

सुप्रभात दगड़ियो
प्रस्तुत छू आजैकि कविता “पलायन“

घट लिजी पांणि हरै गो,
सुख गईं गाड़ गध्यार।
खेति पाति सब चौपट्ट हरै,
जंगली सुअर न्है जानि उज्याण।
फल फूलनाक पेड़ नांगांण,
बानरोंक उत्पात। 
घराक बैग अत्तरी हैगईं,
घरै रूनी दिन रात।
कस पहाड़ छी कस हैगो,
लागू अब निस्वास।
नौजवान चहा दुकान बैठनी,
खेलनी कैरम तास।
नौकरी भैर सुविधा भैर,
यांक गौं में लागिगे डायन।
वीक बाद लै सब्बै कुंणईं,
पहाड़ पन किलै छू पलायन।


जै जै हमार पहाड़! जै जै उत्तरांचल!

उमेश त्रिपाठी (काका गुमनाम) द्वारा रचित एंव प्रसारित
उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" 21-04-2019
श्री उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" जी की फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी शब्द सम्पदा पोस्ट से साभार

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