जिबाइ - कुमाऊँनी कविता

जिबाइ - कुमाऊँनी कविता, kumaoni poem about present conditions,vartman par kumaoni kavita

जिबाइ

रचनाकार: रमेश हितैषी

आजाद हैगु बल हम, 
     क्या सचि आजाद छौ हम?
 
पैलि सैत भौत भल छि,  
     आज जाधे बर्बाद छौं हम।
  
तुम कला किलै कम छा? 
     यौ बात नि सोच मौय हम।

जिंदगी भर मांगणे परि छौ, 
     आजि लै मांगणे मोयु हम।
  
कभें राज कभें राज्य, 
     कभें सुरक्षा मांग मोयु हम।
 
कभें रोटी कभें रोजगार, 
    आज जमीन मांग मोयु हम।
  
एक दिन उन्हा दुखक दिन, 
     आजत उभा आण चाहनु हम।
 
आजि लै ढांकक तीनै पात, 
    क्या देखि लौटणक मन बनु हम।

पुरखों कि कुर्बानी काम नि ऐ, 
     बस अपणुक गुलाम छौं हम।

ग्वारत लुटि बै नहै गई, 
     अब काउल सतै बै धरि रौं हम।
 
आजि लै चितै जाओ, 
    स्वचौ कति हणि जा मोयु हम।
 
हमर दिन त काटि गई, 
     अघिन हणि जिबाइ बुण मु हम। 

सर्वाधिकार@सुरक्षित, 
18-09-2021

श्री रमेश हितैषी
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