प्रकृति संरक्षण से जुड़ा है लोकपर्व फूलदेई

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फूलों से सजाई जाती है देहरी

फूलदेई छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार। यानी यह देहरी फूलों से सजी रहे, घर खुशियों से भरा हो, सबकी रक्षा हो। अन्न के भंडार सदैव भरे रहें। आज सोमवार को चैत की संक्रांति है। उत्तराखंड में इसे फूल संक्रांति के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन घरों की देहरी को फूलों से सजाया जाता है। घर-मंदिर की चौखट का तिलक करते हुए 'फूलदेई छम्मा देई' कहकर मंगलकामना की जाती है। यह सब करते हैं घर व आस-पड़ोस के बच्चे जिन्हें जान फुलारी कहा गया है। फुलारी यानी जो फूल लिए आ रहे हैं। लोक पर्व फूलदेई वसंत ऋतु के आगमन का संदेश देता है। नौकरी, पढ़ाई व दूसरी वजहों से अलग होते परिवारों में प्रकृति संरक्षण से जुड़े इस पर्व को मनाने की परंपरा पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है। विशेषकर नगरीय क्षेत्रों में पर्व अब परंपरा निभाने तक सीमित होता जा रहा है। फूलदेई के लिए बच्चे हाथों में टोकरी, थाल लिए खेतों की ओर निकल पड़ते हैं। ताकि देहरी सजाने को वह चुन सकें, सरसों, फ्योंली व आडू-खुमानी के ताजा फूल। संस्कृति की डा. नवीन चंद्र जोशी कहते हैं कि यह माहौल बच्चों को प्रकृति से जुड़ने व उसमें होने वाले बदलाव को समझने का मौका देता है। डा. जोशी कहते हैं जरूरी नहीं कि लोक पर्व गांव में ही मनाया जाए, जहां और जिस परिवेश में आप रहते हैं, अपने लोकपर्व को वहां पर अवश्य मनाना चाहिए।

लोकगीतों में मिलती है पर्व की छलक
फूलदेई की झलक उत्तराखंड के लोकगीतों में भी दिखती है। उत्तराखंडी लोकगीतों का फ्यूजन तैयार करने वाले पांडवाज ग्रुप ने फुलवारी गीत में फुलारी को सावधान करते हुए गढ़वाली भाषा में लिखा है:-
चला फुलारी फूलों को, सौदा-सौदा फूल बिरौला।
भौरों का जूठा फूल ना तोड्या।
म्यारयूं का का जूठा फूल ना लायां।
अर्थात चलो फुलारी, ताजा फूल चुनने चलते हैं। ध्यान रखना भौरों के जूठे किए व मधुमक्खी की चखे फूलों को न तोड़ना।

दैनिक जागरण सवाददाता, हल्द्वानी, फरवरी १४, २०२२ से साभार

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