
-:जाण तो पड़लै:-
(जाना तो पड़ेगा ही)
लेखिका: अरुण प्रभा पंत
जब बैठ बैठ बेर सब मिलण लागजां तो हमैर काम करणैक क्षमता कम है जैं। हम यो सोच सोच बेर उदासि जानु कि भोल या पोरू बै काम आफि करण पड़ौल। यो सब हम सबनाकै साथ कभै न कभै हुनै छु। कस्तूरी जो गंगाधरज्यूक एकमात्र संतान छि और भल पढ़ी लेखी छी। पढ़ाय पुर करते करते वीक ब्या भोलादत्तज्यूक एक होनहार सुपुत्र कुशल दगै जो केंद्रीय सरकारौक राजपत्रित अधिकारी छी, है गोय।
ब्याक बाद सब रीति-रिवाज पुर कर बेर फिर नय जमानाक अनुसार घूम-फिर बेर कस्तूरी आपण सौरास आपण साससौर और दुल्हौ दगै रूण हुं ऐगे। कस्तूरीक ससुर लै आब सेवानिवृत्त हुणी वाल छी तो उनूल सोचौ कि किलै नै आपण च्योल दगाड़ कुछ दिन व्यतीत करि जाऔ और आनंद मनैई जाऔ। कुशल कं लै यो भल लागौ कि उ लै आपण इज बाबन कं आपण नय नौकरी और वीक दगाड़ मिलणी वाल सुविधानौक सुख दी सकौल। कस्तूरील लै समझौ कि सास अगर दगाड़ रौलि तो उ निश्चिंत है बेर आपण दुल्हौ दगै घूम-फिर सकेलि,घरैक उकं चिंता नि करण पड़ैलि।
कुछ दिन तो ठीक रौ पर जब कुशलैक इजैल वीक दुल्हैण अर्थात आपण ब्वारि कस्तूरी कं घर गृहस्थी और आपण रीति रिवाज और उनन कं के भल लागुं और के नक सब बतूणैक कोशिश करी तो कस्तूरी परेशान हुण बैठी कि उकं तंग करणाक लिजि कुशलैक इज रोज रोज के नय नय काम और बात बतूण लांगें जबकि यो सब तो उ आफि कर सकनी और उ स्वयं आपण फोन पर आपण दगड़िन थैं फसक फराव और टीवी देख सकछी या भलीकै शिण पड़ सकछी। उनार पास तो डबलनैक लै, के कमी न्हां ,नौकर चाकर लै धर सकनी, कुछ कामाक वास्ते मशीन लै ल्हि सकनी। यो सब फिजूलैक बातनाक लिजि वीक टैम खराब करणैक के जर्वत छु।
उ किलैकि उनरि ब्वारि छु अतः जबरदस्ती परेशान करणाक लिजि कुशलैक इज उकं तंग करणाक मंशाल रोज रोज उकं आपण पास बैठैबेर बातचीत में वीक आराम और मनकस समय बितूणैक इच्छि कं दबूण चानी। जब हम क्वे बातौक गलत अर्थ लगूनू तो उ बातौक भल अर्थ हमैर दृष्टि बै ओझल है जां और हम गलत सोचते सोचते सबनौक जीवन में विष घोल दिनुं योयी गलती कस्तूरील करि और वीक परिणाम में सबनौक जीवन दुःखी है गोय।
तैं तुलसीदास ज्यूल कै राखौ--"जहां सुमति वहां संपत्ति नाना जहां कुमति वहां विपति निदाना"।
जब लै के करण हुण या सास चैंछी कि मेर ब्वारि यो काम करेंनि तो कस्तूरी या तो ख्वार पीड़ या नींनौक क्वे बहान बणै कम्र में कैद है जानेर भै। पल्ली तो सब कस्तूरी कं समझ नि सक बाद में उनन कं वीक बहान समझ ऊंण लाग। यो बीच वीक सास सौर आपण शहर न्है ग्याय जां सबै द्वि म्हैण बाद वीक सौरैक सेवानिवृत्ति छी।
आब सास-ससुर यो लै समझ गोछी कि सेवानिवृत्तिक बाद च्याल ब्वारिक पास रूण कठिन होल अतः वी शहर में एक वन बी.एच.के. फ्लैट ल्हिबेर वैं शिफ्ट हैबेर रूण लाग।च्योल कुशल कं भितेरैक तथ्यक के जानकारी न्है छी अतः जब वील सेवानिवृत्त हुण पर मैं बाबनाक आगमनाक बारे में पूछौ तो वीक बाबुल कौ कि उननकं योयी शहरैक सार हैगे ।यैयी रूणौक उनौर मन छु, पर वां तो आपुं कं किरायौक घर में रूण पड़ौल तो उनुल बता कि एक फ्लैट यैं खरिद हैलौ और उमें रूण हुं न्है ग्यान तो कुशल कं लागौ कि वीक मैं बाब जो उथैं सब बात पैल्ली बतै बेर करछी पर ऐल इताण बात छिपै गेयीं।
बातैकि असलियत तो उकं पत्त न्है छी अतः उ मनै मन आपण बेकुसूर सिध साध मै बाबन थैं खिन्न जौ हैगोय। वीक शैण कस्तूरी जकं घरौक काम करण, घर सहेजण, डबल और टैमौक मोल और मान दगै के वास्त न्हैछी कुछ दिन तो भौत खुस्सी भै फिर रोज रोज कुशलाक दफ्तर जाण तक सब खाण तैयार करण च घर कं व्यवस्थित करण वीक बसैकि बात न्हैछी तो रोज झकौड़ मन मुटाव हुनै रुनेर भै। यैक वास्ते घर में नौकर चाकर धरि ग्याय, किस्म किस्माक मशीन किश्त में खरिदी ग्याय फिर लै घर में उ व्यवस्था नि ऐ सकि जो वीक इज बाबनाक छना छि।
भले ही कुशल एक राजपत्रित अधिकारी छी पर हर म्हैणैक पुर वेतन बै अधिकांशतः सामाननैक किश्त और नौकरनैक तंखा में जांण लाग गोय। यैक बावजूद लै घर में टुन्न फुस्स लागियै भै। पुर घरैक शांति खत्म हुण लागि आब कुशल कं घर ऊणौक मनै नि करनेर भौय हर बखत चक चक भै। कस्तूरी कं यमै क्वेलै आपण गलती समझ निउंणैय। कुशल कं आपण मैंबाब लै स्वार्थी लागण बैठ कि सेवानिवृत्ति बाद लै अलगै रुणयीं यां रून तो घरैकि भलि व्यवस्था हुनि।
यो बीच एक दिन कस्तूरिक इजबाब अचानक आपण चेलि जवैंक पास पुज ग्याय। कुशल कं लै लागौ कि अब तौ आपण चेलि कं समझाल और घर चलूणैकि अकल सिखाल। चेलिक रंग-ढंग कुछ तो उं पैल्लियै बै जाणनेरै भाय फिर सब प्रत्यक्ष देख बेर समझ ग्याय कि किलै कुशलाक मैं बाब सेवानिवृत्ति बाद लै यां रूण हुं कै नि उणाय बल्कि वैं यकलै बस गेयीं। जब उनूल आपण चेलि थैं पुछौ तो वील कै दे कि वीक सास भौत्तै तंग करछी और कुशलैल लै कौ कि वीक मैंबाब जो उकं आपण सब बात बतूंछी आब उथैं आपण बात छिपूंण लाग गेयीं।
कस्तूरीक इज बाब सब समझ ग्याय कि किलै ऐस भौन्हौल। उभत तो उनूल के नि कौय। सिद्ध आपण समधी अर्थात कुशलाक बाबू थै फोन पर बात करिऔर उनन थै मिल बेर आपण चेलि कं सबक सिखूणैक एक योजना बणैं। कुछ दिनन मांथ कस्तूरीक इजौक फोन आ कि त्यार बाब आब बदई गेयीं उनौर सभाव क्याप्प है गो जब कस्तूरील पुर बात शुणी तो उकं भौतै रीश ऐ कि यो उमर में बाबुक दिमाग सटिक गो।
कस्तूरील आपण बाबू कं फोन लगा जो उनूल जाण बुझ बेर नि उठाय तो कस्तूरी कं आपण इजैक बात पर विश्वास है गो कि बाबू बदयी गेयीं। जब वीक इज बार बार डाढ़ाडाढ़ कर कस्तूरी कं आपण तकलीफ कूण लागि तो वील फिर फोन लगा तो बड़ मुश्किलैल उनूल फोन उठा तो कस्तूरील उनन कं इज दगै भली कै व्यवहार करण हुं कौ तो कस्तूरीक बाबुल कौ कि जो शैणि घराक काम कं बवाल और घराक मैस और आणी जांणी मैसनौक ध्यान नि धरनि और टैम पर क्वे लै काम पुर नि करनि आपण दुल्हौ याने कि मैथैं तमीजैल बात नि करैनि वीक साथ आब म्यार गुजार कठिन है गो मैं तो त्यार इज कं छाड़ि बेर कैं और जाग रूण चानू और क्वे भलि छै शैण मिल गेई तो दुसौर ब्या लै कर सकनूं तबै त्यार इजाक समझ आल कि ततु मनमानी करणौक नतिज के हुं।
"हे भगवान, बाबू बात यां तक पुज गे, बाबू तस नि करौ मेरि लै कतु बदनामी होलि,तुमार हाथ जोड़ुं"। "हाय तुकं किलै नक लागणौ तु लै तौ आपणै इजैक चेलि छै, त्वील कतु गड़बड़ मचै राखी आपण घर में, तुथैं सिख बेरै तौ तेरि इजौक दिमाग खराब है रौ, तुकों तो योसब भलै लागौल देख ल्हिये एक दिन तुकों लै कुशल छाड़ौल और फिर तुम मै चेलि एक्कै दगाड़ रैया।" ऐस शुणते ही कस्तूरीक सब समझ एगो कि वीक मैं बाब उकं सबक सिखूणाक लिजि यो सब नाटक करणयीं।
उ दिनें वील पैल्ली तो आपण कम्र ठीक ठाक करौ भले ही नौकरनैक सहायता ल्हे। फिर अघिल एक द्वि दिन में पुर घर कं व्यवस्थित करौ। इन दिनन कुशल सरकारि कामैल भ्यार जै रौछी। जदिन कुशल घर आ तो वील आपण घर कं दुसरै ढंग में देखौ और कस्तूरील जब आपण हाथैल चहा बणै बेर लै तो उ दंग रैगो। योयी नै वीक अघिल दिन कस्तूरील आपण सास सौरनाक शहर जाणैक इच्छी जाहिर करी कि उनन थैं माफि मांग बेर उनन कं वापस बुलै ल्यूनू।
यो सब देख बेर कुशल आपण आंख मिनण लागौ कि कैं उ क्वे श्वैण तो नि देखणौय। जब नानतिन क्वे गलती करनी तो मैबाबनौक फर्ज हुं कि उनन कं सही पाठ पढ़यी जाऔ।
कहानी सुनिए अरुण प्रभा पंत जी के स्वर में
मौलिक
अरुण प्रभा पंत, नासिक, 02-11-2020
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