भुर-भुर उज्याव बै छिलुक जांलै

कुमाऊँनी कविता-भुर-भुर उज्याव बै छिलुक जांलै-Kumauni Kavita Life of lone veteran people in Kumaun hills

-:भुर-भुर उज्याव बै छिलुक जांलै:-

लेखिका: अरुण प्रभा पंत

उज्याव तो उज्यावै भौय' आंखन हुं
रत्तै हौल लागि में देखणैक कोशिश
हुनेरै भै तजवीज लै करणै भै अन्यार में
घरैक सयाणि भै हो सब सुदारणै भै
रत्तै बै ब्याल और सितण जालै काम
ऐसिकै मैल यो बाखय पौहरूण भैनै
क्वेआलौ सोच रोज उठ मंसुब म्यार
सड़क बणी में परसाद चढ़ा दि जगा
जब जैक जैक नानतिन भ्यार गेयीं
हम सब्बै फूलैं नि समाय हो हर्षैल
कैकौ भौ जब उनेर भौय हम सबै
एकबटी बेर उकं शुणनेर भयां पर
वीक बदयी मिजाज हम सबै समझ
भिस्मांत में निस्वासी लै जानरै भयां
पर फिर अघिलै'क भल आस लै भई
आपण संतान पै भरोस लै भयै हो 
जब एकएक कर सामान बादण लाग 
आंखौ'क हौल लै खतम होते गोय हो
बेलि बसंती लै हो न्हैगे च्यालाक दगै
आब मैं कैथैं कूं, यो घरौक भराण रैगो
भिड़ैक उधरी दिवाल गोठन गोरु छु
ड्वांड्वा करबतूं एक और दिन ऐगो
जब जाण गेयूं तो यो गोर छन जांलै
रुनु यो उधरी घरैकछत्तर छाया में
द्यापताक थान में लै दि जगूणै भै
नानतिन भ्यार भै धूपबास लै करणैभै
कभै न कभै क्वे न क्वे आलै सही
म्योर होया चंपा'क संतान आपणै भाय
एक एक काकौड़ घुस्याल सबन पर
आपण हक्क जतूणी मैं बिंदुलियैं रै गेयूं

मौलिक
अरुण प्रभा पंत 

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