चिट्ठी उधरी घरै क

कुमाऊँनी कविता- चिट्ठी उधरी घरै'क, मैं यो घरौ'क पाथर भयूं-Kumauni Kavita-Chitthi Udhari Garai'ki

चिट्ठी उधरी घरै'क

लेखिका: अरुण प्रभा पंत

कां बटि शुरु करूं जब तेर बाबू बर बणी
तेरी इज मुकुट लगयी कुर्मू गाढ़ी भै ठाड़ि
माव थैं द्वार पुज शगुनाखर ढोलुकै थाप
तेरि इज दगै तेर आमौक कजि और अबोला
तेरी बाबुक धुर जंगल जै बेर तेरि इज कं मनूण
कभै त्यार ब्यारैक चहल पहल कभै असोजै'क भागा-भाग
होलि दिवाइक तंग्यारी और होल्यार नैक धूम
मकरसंग्रांत में काले काले करनी नानतिन नैक हकाहाक
त्यार नामकंदै'क दैलफैल चुलिकन्यूंत नाचगीत
के निभुल सकन्यू मैं यो घरौ'क पाथर भयूं
आयभली कै उधर नि रयूं मुणी-मुणी ज्यून छुं।

क्वे तौ आऔ मकं थाम ल्हियौ या एकसार कर
क्वे बोट लगै जाऔ जब-जब ठंडी हौ चलैल
जब जब तहौड़ लागौल मैं आपण सब फाम 
और निस्वास उड़ै द्यूंल या बगै द्यूंल
आब निथाइन योनरै यो गौव बुजीण
पाथर छुं पर मैसन दगै रै बेर मैसी लै गेयूं
या मकं अपनाऔ या पुरै उधार दियौ।

मौलिक
अरुण प्रभा पंत 

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