
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
सातूं अध्याय (श्लोक सं. २१ बटि ३० तक)
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।२१।।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।।२२।।
कुमाऊँनी:
मैं प्रत्येक जीवक् हृदय में परमात्मा रूप में स्थित छूं, जब क्वे द्याप्त विशेष कैं पुजणोंक् मन बणां त् मैं वीकि श्रद्धा कैं बल प्रदान करनूं ताकि ऊ द्याप्त विशेषैकि पुज करि सकौ और अपुंण इच्छा क् अनुरूप फल प्राप्त करि सकौ। परन्तु ऊ यौ नि ज्याणन् कि ऊ फल लै मेरी अनुकम्पा ल् ऊकैं मिलौ।
( अर्थात् जीव नि ज्याणन् कि द्याप्तनैकि ताकत् लै भगवान् ज्यु कि कृपा लै फलित हैं । जतुक लै स्वर्ग लोकक् या धरति पार् जनूकैं हम द्याप्त माननूं ऊं सब भगवानैकि कृपा पार् निर्भर छन् । जस् कि हमौर् मोबाइल बैटरी बिना बेकार हैं जां, बिजली बिना टेलीविजन बेकार है जां वी प्रकारैल् द्याप्त लै बगैर भगवान् ज्यु कि कृपाल् शक्तिहीन है जनीं । भगवान् ज्यु कुनई कि फिरि लै क्वे द्याप्तनैकि पुज करूँ तो मैं वीक् मनोबल बढानू ताकि ऊ अपंण इच्छा पुरी सकौ। ऊ इच्छा पुर् करंण में लै म्यरै हाथ छू यौ ऊ कभ्भीं नि ज्याणि सकून्।)
हिन्दी= मैं प्रत्येक जीव के हृदय हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित हूँ । जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा की इच्छा करता है, मैं तुरन्त उसकी श्रद्धा को उस देवता मे स्थिर कर देता हूँ, जिससे वह उसी देवता विशेष की पूजा कर सके। ऐसी श्रद्धा से वह देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है और अपनी इच्छा की पूर्ति करता है, किन्तु वास्तविकता यह है कि यह लाभ भी मेरे द्वारा ही प्रदत्त है।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।२३।।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।२४।।
कुमाऊँनी:
कम बुद्धिवाल् द्याप्तों कैं पुजनी और उन द्याप्तों द्वारा दियी हुई फल सीमित और क्षणिक हुंनी, द्याप्तों कैं पुजणी देवलोक जनीं पर जो मिकैं पुजनी ऊं सिद्द म्यर् परमधाम में वास करनीं । बुद्धिहीन मनखि सोचनीं कि यौ त् पैली निराकार छी, और आब् कृष्ण रूप में धरति पार् छु पर ऊं अल्पज्ञानी मेरि अविनाशी और सर्वोच्च प्रकृति कैं नि समजि सकन्।
( अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि जो मिकैं छोड़ि अन्यान्य द्याप्तनैकि जस् कि सूर्य, चन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, इन्द्र आदि या फिरि शनि, राहु, केतु अथवा स्थानीय लोकमान्य द्याप्तनैकि पुज करनीं उनूकैं उन द्याप्तूं द्वारा फल(आशीर्वाद) लै मिलनी पर ऊं सब सीमित और क्षणिक हुंनी किलैकि ऊं सब्बै द्याप्तों कि पास जो आशीर्वाद दिणैंकि शक्ति छू ऊ लै म्यरै आशीर्वादैल् हैं छ्। तब उन् फलूंकि आयु लै कम हैं और जब उनर् समय पुरी जां त् फिरि मनखि कैं दुहर् जनम ल्हिणांक् वास्ते धरति पार् ऊण पडूं किन्तु जो मेरि भक्ति करूँ ऊ सिद्द म्यर् परमधाम कैं प्राप्त करूँ , और मील् अन्य जीवों क् दगड़ मनखि कैं लै बुद्धि दी पर बुद्धि अलावा मनखि कैं एक विशेष चीज जै हैं विवेक ( सोचण और समजणैकि शक्ति) कूनीं ऊ अलग दी, आब् मनखि ऊ विवेकक् प्रयोग नि करि खाल्लि बुद्धि क् प्रयोग करल् त् यौ ई संसार में कभ्भीं मनखि, कभ्भीं पशु या पक्षी अथवा जलचर, थलचर आदि योनियों में भटकते रौल्)
हिन्दी= अल्पबुद्धि वाले व्यक्ति देवताओं की पूजा करते हैं और उन्हें प्राप्त होनेवाले फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं। देवताओं की पूजा करनेवाले देवलोक को जाते हैं, किन्तु मेरे भक्त अन्ततः मेरे परमधाम को प्राप्त होते हैं। बुद्धिहीन मनुष्य मुझको ठीक से न जानने के कारण सोचते हैं कि मैं (कृष्ण) पहले निराकार था और अब मैने इस (कृष्ण रूप) स्वरूप को धारण किया है वे अपने अल्पज्ञान के कारण मेरी अविनाशी तथा सर्वोच्च प्रकृति को नहीं जानते।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।२५।।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।
कुमाऊँनी:
भगवान् ज्यु कुनई कि मैं मूर्ख और कम अक्कल वलां ल्हिजी कभ्भीं परगट नि हुंन , उनर् ल्हिजी मैं अपणि अंतरंगा शक्ति द्वारा ढकी रूनूं और ऊं यौ नि ज्याणि सकन् कि मैं जन्मरहित या कभ्भीं नाश हुंणी वाल् नि छू। हे अर्जुन! भगवान् हुणाक् नाते मैं ज्ये लै भूतकाल में घटित है गो, जो वर्तमान में घटणी छु और जो आघिल् हुंणी वाल् छू ऊ सब ज्याणनू।
( मली लिखी बातक् समर्थन में एक उदाहरण यौ छू कि कौरव या पाण्डव या उनर् सम्बन्धियों में कुन्ति, पांच भै पाण्डव, द्रौपदि, बिदुर, भीष्म, द्रोण आदि कुछै लोग छीं जो ज्याणछी कि श्रीकृष्ण भगवान् छीं और धृतराष्ट्र , दुर्योधन समेत सब्बै कौरव या जो लै दुर्योधन तरफ छीं ऊं सब्बै श्रीकृष्ण कैं एक साधारण (अपुणै जस्) मनखि समजछी । तब्बै भगवान् ज्यु कुनई कि सब लोग मिकैं नि ज्याणि सकन् और जो ज्याणि जांछ त् वीक् बेड़ा पार है जां)
हिन्दी= मैं मूर्खों तथा अल्पज्ञों के लिये कभी प्रकट नहीं हूँ, उनके लिए तो मैं अपनी अंतरंगा शक्ति द्वारा आच्छादित रहता हूँ, अतः वे यह नहीं जान पाते कि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूँ । हे अर्जुन! भगवान् होने के नाते मैं जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है, जो वर्तमान में घटित हो रहा है और जो आगे होनेवाला है वह सब कुछ जानता हूँ।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्दमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।
येषां त्वन्तगतं पापों जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्दमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।२८।।
कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! सब्बै जीव जनम् ल्हिबेर् इच्छा और घृणा द्वारा पैद् हुई द्वन्दु कारण मोहग्रस्त रूनीं, जनूंल् पैलि जनम् में पुण्यकर्म करी हुई छन् और जनर् पापकर्म खतम् है गयीं ऊं मोहक द्वन्दु है मुक्त है बेर् संकल्पक् साथ मेरि सेवा या म्यर् भजन में लागि रूनीं।
( अर्थात् जो इच्छा क् वश में रूनीं, जो मोहग्रस्त रूनीं, जो अपणि विद्वताक् प्रदर्शन करनीं , और अपणि-अपणि विद्वताक् प्रदर्शन करि बेर् धनार्जन करनी यस् मनखि भले ही यस् ढोंग रचनीं कि हमत् भगवान् ज्यु कैं ज्याणनूं तुम हमरि शरण में आओ , हम तुमूंकैं भगवान् दगड़ मिलूल् तो यस् लोग कभ्भीं भगवान् ज्यु कैं नि ज्याणि सकन् । यस लोग सिद- सिद् लोगन् कैं बरगलै बेर् अपंण ल्हिजी धन-सम्पदा जोडनीं और कुछ नै। ढोंग या बनावटीपन त् भगवान् ज्यु कैं कतई पसन्द न्हैंति, उनूकैं नरसी, मीरा, शबरी, केवट, सुदामा और मोरध्वज या प्रह्लाद, ध्रुव और सूरदास जस् मनखि पसन्द छन् जो तन- मन लगे बेर् अपणि-अपणि शरीरैकि सुध-बुध त्यागि बेर् भजन करनीं।)
हिन्दी= हे भरतवंशी! हे शत्रु विजेता! समस्त जीव जन्म लेकर इच्छा तथा घृणा से उत्पन्न द्वन्दों से मोहग्रस्त होकर मोह को प्राप्त होते हैं । जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्मों में पुण्यकर्म किये हैं और जिनके पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन हो चुका होता है, वे मोह के द्वन्दों से मुक्त हो जाते हैं और वे संकल्प पूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यान्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।२९।।
सिधिभूताधिदेवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।।३०।।
कुमाऊँनी:
जो बीमारी (कष्ट)और मरण है मुक्त हुंण चांनी, ऊं बुद्धिमान मेरि भक्ति कि शरण में जानीं । ऊं वास्तव में ब्रह्म समान छीं किलैकि ऊं दिव्य कर्मूं क् विषय में ज्याणनीं ।जो मिकैं पूर्ण चेतन है बेर् जगतक् , द्यापतोंक् और सब्बै यज्ञविधियोंक् कारण ज्याणनीं ऊं अपंण मरण तक मिकैं ज्याणि और समजि सकनीं।
( अर्थात् भगवान् ज्यु कि भक्ति में यतुक् शक्ति छू कि यदि मनखि शुद्ध भाव धरि बेर् प्रभु भक्ति में लीन छु तब मरण बखत् लै ऊ भगवान् ज्यु क् स्मरण करते रूँ ( यौ सब्बन् है ठुलि बात छू कि मरण बखत् मनखि यतुक् विह्वल है जां कि वीकैं भगवान् त् दूर अपणि होश लै नि रूंनि) पर भक्ति में यौ शक्ति छू कि मनखि भले ही सारी बात भुलि जाओ पर शुद्ध भक्ति क् कारण भगवान् ज्यु कैं नि भुलि सकौन् और मरण बखत् जो भगवान् कैं याद् करूँ वीकि मुक्ति है जैं, ई में क्वे संशय नि करंण चैन्)
हिन्दी= जो जरा, मृत्यु से मुक्ति पाने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं, वे बुद्धिमान व्यक्ति मेरी भक्ति की शरण ग्रहण करते हैं । वे वास्तव में ब्रह्म हैं क्योंकि वे दिव्य कर्मों के विषय में पूरी तरह जानते हैं । जो मुझ परमेश्वर को मेरी पूर्ण चेतना में रहकर मुझे जगत् का, देवताओं का तथा समस्त यज्ञविधियों का नियामक जानते हैं, वे अपनी मृत्यु के समय भी मुझ भगवान् को जान और समझ सकते हैं।
🙏🏼 आपूं सब्बै मित्र लोगनक् सहयोगैल् सातूं अध्याय अध्याय पुरी गो कूंछा, धन्यवाद् 🙏🏼
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
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