बताओ धै कसीकै रुं

कुमाऊँनी कविता-फल फूल बानर उजाड़ी ग, गोरु बच्छा में बाग पलकी रौ-Kumauni Poem about problems pahadi's

बताओ धै कसीकै रुं

रचनाकार: राजू पाण्डेय

पहरू कुमाउनी मासिक पत्रिका कै जनवरी अंक में मेरी रचना
बताओ धै कसीकै रुं के छापना थे 
संपादक महोदय श्री Hayat Singh Rawat ज्यूँ के भौते भौत धन्यवाद
आपुले पढ़ो धै

तुम कुच्छा गौं ने रौ
बताओ धै कसीकै रुं

उधार पुधार करि कसी कै
दस गडा में आलू लगै
सुगरो फौज रात में दाज्यू
सब तहस नहस करि लिगै
कि खवु ननतिन क्याको बनु ब्युं
बताओ धै कसीकै रुं।

फौजी भाया छुट्टी आयो
दयू पाठा बाकुरा दिगौ
साल भरी पालिये बाकुरी
दिने बाग दनाली लिगौ
ये ग्वाला बठे मि कसिकै घर जूं
बताओ धै कसीकै रुं।

बोजी बोक्नो काम छयो जो
बूती आब उले भूसी गै
घर घर मोल मोल सबोका
दाज्यू मोटर पूजी गै
दयू रोटा जुगाड़ आब कथकै जूं
बताओ धै कसीकै रुं।

पढन में तेज चेलो रमुआ
आलौ फर्स्ट दस पास हैग
आब अघिल के की करूँ
मन सुजायी अगगास रैग
दस है अघिल आब कथिकै पढूं
बताओ धै कसीकै रुं।

फल फूल बानर उजाड़ी ग
गोरु बच्छा में बाग पलकी रौ
अस्पतालों में दवा डॉक्टर ना
जौन मानस नशा में जकड़ी रौ
"राजू" मि आपनो दुःख कैथे कूं
बताओ धै कसीकै रुं।

~राजू पाण्डेय, 16-02-2020
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