झलक - कुमाऊँनी गीत

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"झलक"

कुमाऊँनी  गीत
रचनाकार: मोहन चन्द्र जोशी
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कसि पौं कसि पौं तेरि एक झलक। य पुजो कसि बात तौं कानों तलक।। कसि दीठि द्यखौं मि तेरी एकटक्।। दुख और नैं के सुख एक्कै देखीं। नैं बीसैकि उन्नीस न मणीं लै फरक।। देखि है ज्यौंनैं जी सरग नरक।। अणकस्सै हिया पर मुख नि जण्यै। आब् छौंक दिहौं लै झस्स हणैं।। हरै गो टपकि उ भात"क् भानक्। हैगे हाव् अकरी और पाणि लै अकर। उस्सै लासण प्याज उस्सी अरहर। असमान टमाटर और उ मलक।। हरै खीर गेई भली लसपसी। बिमार अनार लै खाँछ कसि।। देखि है ज्यौंनैं जी सरग नरक।। मर्ज्यात बुसिण हैगे अणकसी। मनख्योव दिन पर दिन जाणैं नशी। य बखत द्यख भौतै नकनक।। मन में धरि बात य गैर रैगे। कुड़ि छाण लै वश है भ्यैर हैगे। कसि टीप जोणीं उ काँनौं झुमक। ज्यौंन पराण य नाँज मोल क्।। छन भकार खाल्लि टुपार् गोलक। भगवान यसै रौंल कब तक।। आब् सौ की बात हजार ल्हैगे। बजि गीं बाखई बाँजि स्यार रैगे। मोहना य बतौ कसि रौं निझरक।।
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मोहन जोशी, गरुड़, बागेश्वर। 08-07-2016

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