
-:ठीक कुंणयुं नै:-
लेखिका: अरुण प्रभा पंत
दांतैल छिल मुखैल चुस कुछ बुकाय
ऐसिकै हमुल रिखु खाय लै खवाय लै
बदामि खुबानिक बीज हौ या आंखोड़
सब जाग हमार दांतौक भौय कमाल
पड़ाक्क आंखोड़ फ्वाड़ रिखु चुस
बीज बदामि खुबानि नि टिक सक
सबै फोड़ खाय हमुल पड़म्म पड़म्म
इजौर खन, तरुड़ैक खाड़ लै खनि
ठांग और घुस्यालैल लगिल बै लौकि
काकौड़, क्यावैक घड़ि लै दंणकाय
केमें निडरां किरावाक फूल लै चाय
तिमुल ,आम, स्यो ,तोड़ खाय ढ़ुगैल
उजाड़ गेयी बल्द गोर भैंस सादि भाय
के काममें नि डरां तब परआब डरनू
आपण गौं घर, जाण में, तकलीफ छु
कैसी रूंल ,के करुंल, केखूंल, कां जूंल
दै भाऊ तब रै सकन छिया आब कैनै
मौलिक
अरुण प्रभा पंत
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