
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
तेरूं अध्याय - श्लोक (०१ बटि १२ तक)
अर्जुन उवाच-
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।१।।
श्रीभगवानुवाच-
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।२।।
कुमाऊँनी:
अर्जुन कूंण लागौ कि- हे केशव! प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेयक् विषय में मैं ज्याणण चानूं। तब भगवान् ज्यु कुनई कि - हे कुन्तीपुत्र! यौ जो शरीर छू वी क्षेत्र छू और जो यौ शरीर कैं ज्याणों ऊ क्षेत्रज्ञ छू।
(अर्थात् इन्दिय युक्त शरीर कैं क्षेत्र (खेत) बतै रौ और जो यौ शरीर कैं ज्याणों अर्थात् यौ शरीर द्वारा काम ल्यूं ऊ क्षेत्रज्ञ कयी जां। यौ शरीर में इन्द्री छन् त् इन्द्रिय विकार लै छन् । इन विकारनैकि पूर्ति करणीं शरीरक् स्वामी या क्षेत्रज्ञ कयी जां।)
हिन्दी= अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण मैं प्रकृति एवं पुरुष, क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान एवं ज्ञेय के विषय में जानने का इच्छुक हूँ। तब श्रीभगवान् कहते हैं- हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है और इस क्षेत्र को जाननेवाला क्षेत्रज्ञ है।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतों मम।।३।।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारियतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु।।४।।
कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! तुमूंकैं यौ समजंण चैं कि मैं सब शरीरौंक ज्ञाता (जाणण वाल् ) छूं, और यौ शरीर तथा येकैं ज्याणणियें कैं ज्याणण् ज्ञान कयी जां। आब् तुम संक्षेप में सुणौ कि कर्मक्षेत्र क्या छू, यौ कसिक् बणौ, यमैं क्ये-क्ये बदलाव हुंनी, यौ कां बटी पैद् हूं, यौ कर्मक्षेत्र कैं ज्याणणीं को छू और येक् प्रभाव क्ये छीं।
(अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि - मनखि भले ही अपंण शरीर क् बार् में ज्याणौं हुनल् पर दुसर् शरीरक् बार् में नि ज्याणन् परन्तु मैं संसार में जतुक लै शरीर छन् उन सबनांक् बार् में ज्याणनूं। जसिकै एक मनखि भले ही अपंणि खेति, घर आदिक् बार् में ज्याणौं, पर ऊ देसक् रज सब देशवासियों क् खेति या भू-खण्डोंक् बार में ज्याणौं। तो भगवान् ज्यु है क्वे बात छिपी हुई न्हैति, तब्बै भगवान् ज्यु कैं सर्वव्यापी जगदीश्वर कयी जां।)
हिन्दी= हे भरतवंशी! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए मैं समस्त शरीरों का ज्ञाता भी हूँ, और इस शरीर तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ज्ञान कहलाता है। अब तुम मुझसे यह सब संक्षेप में सुनो कि कर्मक्षेत्र क्या है, यह किस प्रकार बना है, इसमें क्या परिवर्तन होते हैं, यह कहां से उत्पन्न होता है, इस कर्मक्षेत्र को जाननेवाला कौन है और उसके क्या प्रभाव हैं।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः।।५।।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिर्व्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः।।६।।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।७।।
कुमाऊँनी:
वैदिक ग्रन्थों में ऋषियोंल् कार्यकलापोंक् क्षेत्र और उन कार्यकलापों कैं ज्याणणीं वलक् ज्ञानक् बार् में वर्णन करि रौ। विशेषकर वेदान्त सूत्र में तर्क समेत प्रस्तुत करि रौ। पांच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, दश इन्द्री, मन, पांच इन्द्रीविषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुख आदि जीवनक् दश लक्षण और धैर्य इन सब्बूं कैं संक्षेप में कर्मक्षेत्र या वीक् विकार कयी जां।
(अर्थात् यौ ज्ञानैकि व्याख्या करण में भगवान् श्रीकृष्ण सब्बूं है ठुल् प्रमाण छन् । फिरि लै विद्वान् या प्रामाणिक लोग पूर्ववर्ती आचार्यूंक् साक्ष्य प्रस्तुत करनीं। कृष्ण, आत्मा और परमात्मा कि द्वैतता या अद्वैतता सम्बन्धी विवादपूर्ण विषय पार् वेदान्त सूत्र नामक् शास्त्रौक् उल्लेख करी गो, जो वेदव्यास ज्यूल् ल्यखौ। मित्रो! ज्यादे जानकारी ल्हिजी उपरोक्त ग्रन्थक् अध्ययन करंण चैं।)
हिन्दी= विभिन्न वैदिक ग्रन्थों में ऋषियों ने कार्यकलापों के क्षेत्र तथा उन कार्यकलापों के ज्ञाता के ज्ञान का वर्णन किया है। इसे विशेष रूप से वेदान्त सूत्र में कार्य-कारण के समस्त तर्क समेत प्रस्तुत किया है। पञ्च महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (तीनों गुणों की अप्रकट अवस्था) , दशों इन्द्रियां तथा मन, पाँच इन्द्रिय विषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात, जीवन के लक्षण तथा धैर्य इन सबको संक्षेप में कर्म का क्षेत्र तथा उसकी अन्तःक्रियायें (विकार) कहा जाता है।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।८।।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।९।।
अशक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।१०।।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ।।११।।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।।१२।।
कुमाऊँनी:
मली जो लै ल्येखि रौ वीक् कुमाऊँनी अनुवाद करणैकि जर्वत् मेरि समजैल् न्हां।
(अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि जो लै मिल् बता यौ ई ज्ञानक् लक्षण छन् , बांकि सब अज्ञान छू आब् तुम आपुकैं ठुल समजंछा या नान् समजंछा, धनवान या निर्धन समजंछा, बली या निर्बल समजंछा, ज्ञानी या अज्ञानी समजंछा, धर्मि या अधर्मि समजंछा त् यौ तुमरि भूल छू अज्ञान छू। श्रीमद्भगवद्गीता ज्यु क् यौ ई सार छू कि तुम कर्म करौ, जस- अपजस् या लाभ-हानि मिपार् छोड़ि दियौ, किलैकि तुमर् उद्धार या पतन सब म्यर् हाथ में छू।)
हिन्दी= विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अंधकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन- समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकार करना, तथा परम सत्य की खोज- इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इसके अतिरिक्त जो भी है , वह सब अज्ञान है।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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