
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
अग्यारूं अध्याय - श्लोक (१२ बटि २३ तक)
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।।१२।।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।।१३।।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषतः।।१४।।
कुमाऊँनी:
यदि अगास में हजारों हजार सूर्य एकदगड़ै उदय है जैं त् शैद भगवान् ज्यु क् विश्वरूपक् तेजैकि बराबरी करि सकीं? उतक् अर्जुन भगवान् ज्यु क् विश्वरूपक् एकै जाग् में स्थित हजारों भागों में विभक्त ब्रह्माण्डक् अनेकानेक अंशू कैं द्येखण लै रौ। तब मोहग्रस्त, आश्चर्यचकित और रोमांचित हई अर्जुनैल् प्रणाम करंण ल्हिजी मुनव झुका और प्रार्थना करंण लागौ।
(अर्थात् अर्जुनैल् ज्ये लै द्यखौ ऊ त् अकथनीय छू, फिरि लै संजय यथाशक्ति प्रयास करंण लै रौ कि धृतराष्ट्र कैं ऊ घटनाक्रमक् अधिकाधिक वर्णन करि सकौ। संजय हजारों सूर्य दगड़ विश्वरूपकि तुलना करणक् प्रयास करनौ। कि अर्जुन ऊ विश्वरूप में एकै जाग् पार् अनेक ब्रह्माण्ड देखनौ और आश्चर्यचकित, रोमांचित है बेर् भगवान् ज्यु तैं प्रणाम करिबेर् प्रार्थना करंण लैगो।)
हिन्दी= यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदय हों , तो उनका प्रकाश कदाचित् परमपुरुष के इस विश्वरूप के तेज की समता कर सके ? उस समय अर्जुन भगवान् के विश्वरूप में एक ही स्थान पर स्थित हजारों भागों में विभक्त ब्रह्माण्ड के अनन्त अंशों को देख रहा है। तब मोहग्रस्त एवं आश्चर्यचकित और रोमांचित हुए अर्जुन ने प्रणाम करने के लिए मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा।
अर्जुन उवाच-
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वास्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माण्डमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरंगाश्च दिव्यान्।।१५।।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ।।१६।।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ।।१७।।
कुमाऊँनी:
अर्जुन कूंण लागौ कि, हे भगवन्! तुमर् यौ विश्वरूप शरीर में सब प्रकारक् द्यप्त, और अन्य अनेकों जीवों कैं मै एकदगड़ै द्येखनौयू। कमल पर बैठी हुई ब्रह्मा, और शिवज्यु तथा सब ऋषियों, पवित्र स्यापों कैं द्येखनौयू। हे विश्वेश्वर! तुमर् यौ शरीर में भौत्तै हाथ, पेट, मुख और आँख छन् जो सब दिशाओं में फैलि रयीं, जनर् न आदि छू न मध्य और न अन्त छू। हे भगवन्! तुमर् यौ रूप यतुक चकाचौंध मय छू , जस् प्रचण्ड आग, और दैदीप्यमान सूर्य क् प्रकाश चारों ओर फैली हुनल् और अनेक मुकुट, गदा तथा चक्र आदिल् विभूषित छू । यौ रूप् कैं यतुक् तेजक् कारण द्येखण कठिन छू, फिरि लै तुमरि कृपाल् मैं येकैं द्येखनौयू।
(अर्थात् भगवान् ज्यु क् विश्वरूप यतुक् विशाल छू जैक् बखान करंण भौत्तै कठिन छू। फिरि लै जो रूप कैं द्येखणां ल्हिजी ऋषि, मुनि, और सब्बै द्याप्त लालायित रूनीं, भगवान् श्रीकृष्ण ज्यु कि कृपाल् अर्जुन ऊ विश्वरूपक् दर्शन करंण लागि रौ।)
हिन्दी= हे भगवान् कृष्ण! मैं आपके शरीर में सारे देवताओं तथा अन्य विविध जीवों को एकत्र देख रहा हूँ। कमल पर आसीन ब्रह्मा, शिवजी तथा समस्त ऋषियों एवं दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ। मैं आपके शरीर में अनेकों हाथ, उदर, मुँह तथा आँखे भी देख रहा हूँ, जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका न आदि है न अन्त है और न ही मध्य है। हे पुरुषोत्तम! आपके रूप को उसकी चकाचौंध के कारण, जो प्रज्वलित अग्नि की भांति अथवा सूर्य के अपार प्रकाश की भांति चारों ओर फैला है, और जो अनेकों मुकुटों, गदाओं तथा चक्रों से विभूषित है, देख पाना कठिन है, फिर भी आपकी कृपा से मैं उसे देख पा रहा हूँ।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतों मे ।।१८।।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहूं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।१९।।
कुमाऊँनी:
हे भगवान् ज्यु! यौ ब्रह्माण्ड में जो लै ज्याणण् लैक छु ऊ तुमी छा। यौ ब्रह्माण्डक् अधार लै तुमि छा। तुम सनातन धर्मक् पालक भगवान् छा। तुम आदि, मध्य और अन्त रहित छा। तुमर् जस अनन्त छू। तुमर् असंख्य हात् छन् और सूर्य चन्द्र तुमर् आँख छन् तुमर् मुख बटि जो अग्नि प्रज्वलित हुंण लागि रै वीक् तेजैल् मैं समस्त ब्रह्माण्ड कैं जलते हुए द्येखनौयू।
(अर्थात् भगवान् ज्यु क् ऐश्वर्य असीम छू, जैकि क्वे सीमा न्हां, भगवान् ज्यु क् गुणगान जतुक् करौ ऊ कमैं छू। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।)
हिन्दी= आप परम आद्य ज्ञेय वस्तु हैं। आप इस ब्रह्माण्ड आधार हैं। आप अव्यय तथा पुराण पुरुष हैं। आप सनातन धर्म के पालक भगवान् हैं। यही मेरा मत है। आप आदि, मध्य तथा अन्त से रहित हो। आपका यश अनन्त है। आपकी असंख्य भुजाएँ हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा आपकी आँखें हैं । आपके मुख से प्रज्वलित अग्नि निकलते और आपके तेज से इस पूरे ब्रह्माण्ड को जलते हुए देख रहा हूँ।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्।।२०।।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।।२१।।
कुमाऊँनी:
हे महात्मन्! तुम भले ही एक छा, यौ स्वर्ग और धरती बीचक् अगास और सब्बै दिशा तुमरै कारण परिपूर्ण छन्, और तुमर् यौ अलौकिक भयंकर रूप कैं देखिबेर् तीनों लोकन् में भय व्याप्त है रौ। द्याप्तोंक् समूह तुमूमें समाण लै रयीं और क्वे हाथ जोड़िबेर् तुमर् नाम और गुणक् गायन करनयीं। महर्षि और सिद्ध लोग "कल्याण हौओ" यस् कै बेर् वैदिक स्तोत्रों द्वारा तुमरि स्तुति करनयीं।
(अर्थात् भगवान् ज्यु सर्वव्यापी छन् और समस्त लोक उनर् तेज और इच्छा क् कारण संचालित हुंनी । सिद्ध और मुनि हमेशा भगवान् ज्यु कि स्तुति वेदमन्त्रों द्वारा करनैं रूनीं, यस् अर्जुन प्रत्यक्ष द्येखण लै रौ।)
हिन्दी= हे महात्मन्! यद्यपि आप एक हैं, यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का समस्त आकाश तथा सब दिशाएं आपसे ही परिपूर्ण हैं, तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अति व्यथा को प्राप्त हो रहे हैं। देवों का सारा समूह आपकी शरण ले रहा है और आपमें प्रवेश कर रहा है। उनमें से कुछ अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी प्रार्थना कर रहे हैं। महर्षियों तथा सिद्धों के समूह "कल्याण हो" ऐसा कहकर वैदिक स्तोत्रों का पाठ करते हुए आपकी स्तुति कर रहे हैं।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।।२२।।
रूपं महत्ते बहुकक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथातास्तथाहम्।।२३।।
कुमाऊँनी:
शिवज्यु क् अनेक रूप, आदित्यगण, वसु, साध्य, विश्वेदेव, द्वियै अश्विनिकुमार, मरुद्गण, पितृगण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्ध देव तुमूंकैं आश्चर्य पूर्वक द्येखनयी। तुमर् भौत् प्रकारक् मुख, आंख, हात, जङ्गड़, गुट, पेट और भयानक दांतों वाल् विराट रूप कैं देखिबेर् द्याप्तों सहित सब्बै लोक भौत्तै विचलित छन्, और उनरि चारी मी लै व्यथित छूं।
(अर्थात् भगवान् ज्यु क् जो विराट रूप अर्जुन या और भाग्यशाली (सञ्जय, भीष्म आदि) द्येखनयी वीकैं द्येखि बेर् द्याप्त और सब्बै लोक आश्चर्य करनयी और अर्जुन कूंण लागि रौ कि मिलै उनरि चारी आश्चर्य में छूं।)
हिन्दी= शिवजी के विविध रूप, आदित्यगण, वसु, साध्य, विश्वेदेव, दोनों अश्विनिकुमार, मरुद्गण, पितृगण, गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सिद्धदेव सभी आपको आश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं। हे महाबाहु! आपके इस अनेक मुख , नेत्र, बाहु, जङ्घा, पाँव, पेट तथा भयानक दाँतों वाले विराट रूप को देखकर देवतागण सहित सभी लोक अत्यन्त विचलित हैं, और मैं भी उन्हीं की तरह हूँ।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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