कुमाऊँनी किस्सा, सिरकाइ - आम्-नातिणि'क क्वीड़, Kumaoni satire about dairy farming in Kumaon villages

सिरकाइ

(आम्-नातिणि'क क्वीड़)

लेखिका: रेखा उप्रेती


बेबेली ब्याल स्वैण में आम् देखि गे कुँछा।  पूछण बैठी “च्याला, धिनाई कदु छू?

मील कौ “मस्त छू आमा।  ए मदर डेरी छू, ए अमूल छू, ए नोवा छू, आनंदा छू ... आइ नान-नान जा भौत छन।”


“भल भौय ईजा... पै गोरु-बाँछन’क तास नाम के धरी भा’य त्यार सौरासियूंल” आम’कं हँसि पड़ि गेइ।  हाड़ी! कदु मीठ लागें आम’क हँसि ...

“कदु दूद दिनी ?” आम् फिर पूछण पड़ि।

“के हिसाबै नि भौय, जदु पगुरिए सकछा।  बस हरि-हरि पात खितण पड़नी ...”


पैss!! आम् हैरान जै है गेयि।  गोठ-पात को करं?  घा को ल्यूं?  छाँ को फानुं?  जा’स् कदुकै सवाल पुछि दि आमै’ल...

मी ले शान में आई भयुं .. “क्वै कं केs निकरण पड़न आमा, सब आफि है जाँ ... दूद, दै, नौणि, घ्यु, छाँ ... जदु कूँछा उदू ...”


आम् थोड़ि देर म्यार मुख कं सुझैs रै, फिर कूँण लागि “ईजा, पै धिनाई खाई जै सिरकाई त केs नि देखिणयी ...”

उ त भल भौ होs, दूदवालै’ल घंटी बजै बे मेरि नीन टोड़ देछ। 

नंतर के जबाब दिछि आम्कं!!