
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
तु
"डो्क" न्हाँत्यै जो
पुठ में
सदा बैठि रौवै।
भकार बँण
सबै खोला्ल
ते कैं ले
भल लागौ्ल।
मनखी ले
उज्याव करौं बल
किताबन् में
लेखी ले छ।
गा्व जाँणै
ठोसी रौलै त
..... भूख
काँ बै लागैलि ....
ज्यूँन रुँणां लिजी
"भूख" जरुरी छ।
बोट-डावन ले
देखी कर
तु नाँचण
सिख् जालै।
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पोथी .....
तुम ऐ जाऔ
बा्ट चै रौ
जरुर
आया हाँ ....
बोट फयि रौ
नारिङै झुकि पड़ि रै
चाड़ - प्वा्थ
ऊँण रयीं ....
तुम लै
ऐ जाना धैं
गुन्याव मे ......
दम्मू - नङार
बाजण बै जा्न
भोकर ताँणी जा्न....
तुमैरि याद में
छो फुटन् छो.....
इजरकूँ नौव में ज
पाँणि है जा्न .....
पा्ल छ्यो घट
आफि है रिङण बै जा्न
गूल ले
सुँसांट पाड़ैनि .....
दिगौ!
तुम ऐ जाना त
रौन छै
आ्ग है जा्न.....
छिलुक ल्ही बरि
तुमन देखन्यूँ
मूँ .......
बखायि छूँ
कैकी इंतजारी में
आजि ले
ज्यूँन छूँ।
शब्दार्थ:
डो्क - बैंत का बिना छोटा ड्रम जैसा जिसे पीठ पर लादकर सामान, खाद आदि ले जाते हैं।
भकार - अनाज भंडारण हेतु लकड़ी बक्सा,
खौला्ल - खोलेंगे,
ठोसी - भरा हुआ
झुकि - लदा होना,
गुन्याव --- आँगन,
रौन छैं - घर के कोने में आग तापने/चाय बनाने का स्थान
मूँ - मैं
कुछ और भी अंग्रेजी भावानुवाद किए हैं पाण्डे जी ने, जिन्हें फिर लिखूँगा।
July 23, 24, 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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