
कुमाऊँ के चंदकालीन परगने- तराई
(कुमाऊँ के परगने- चंद राजाओं के शासन काल में)
"कुमाऊँ का इतिहास" लेखक-बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार
तराई
भावर के बाद तराई का हिस्सा है। इसकी उत्पत्ति दो प्रकार से हो सकती है-हिन्दी 'तर' याने नीचे तराई या उर्दू तरी + श्राई = तराई। यहाँ पर भावर की पथरीली व रेतीली भूमि में छिपा हुआ पानी आप से आप निकल पाता है। यह भूमि ७०० से लेकर ७९५ फीट तक ऊँची है। यहाँ पानी की इफरात है। ठौर-ठौर पर पानी सोतों से निकल पड़ता है। इन्हें 'झांते' कहते हैं ५-७ हाथ जमीन खोदने पर पानी निकल आता है। कहीं-कहीं बरसात में कुएँ ऊपर तक भर जाते हैं।
पानी में तेल की-सी काई जमी रहती है। यहाँ लम्बी-लम्बी घास ब बेत की झाड़ियों बहुत है। वनस्पति यहाँ बेशुमार होती है। यहाँ जाड़ों में प्रचंड जाड़ा और गरमियों में प्रचंड गरमी पड़ती है। दिन में गरमी, रात को जाड़ा होता है। मच्छर बहुत होते हैं, जिनसे मलेरिया (ताप ) ज्वर बहुत होता है। हाथ-पैर पतले हो जाते हैं, पेट बढ़ जाता है। तिल्ली भी बढ़ जाती है। यहाँ की बुरी आवहया को केवल थाड़ू व बोक्से किसी कदर जीत सके हैं। ये ही यहाँ के पुराने व जबरदस्त कृषक हैं।
तराई का वृत्तान्त
तराई का लगभग १०-१२ मील का एक चौड़ा टुकड़ा काशीपुर से लेकर उधर शारदा के किनारे बनबसा तक चला गया है। किछहा से लेकर बनबसा तक ज्यादातर थारुओं की बस्ती है। इसे बिलारी भी कहते हैं। यहाँ के मुख्य स्थान खटीमा, बनवसा, सितारगंज, किच्छहा, नानकमता हैं। खटीमा में बाजार, स्कूल, तहसील है। नहर भी गई है। बनबसा में शारदा नहर का मूल-स्थान है। यहाँ का पुल व नहर का बाँध देखने योग्य है। मलेरिया यहाँ मूर्तिमान् दिखाई देता है। सितारगंज व किछहा सदर मुकाम है। नानकमता में सिखों का गुरुद्वारा है। कहते हैं कि गुरु नानक यहाँ आये थे।

रुद्रपुर राजा रुद्रचंद के और बाजपुर राजा बाजबहादुरचंद के समय के बसाये हुए नगर हैं। रुद्रपुर में पहले तहसील थी, अब नहीं है। यहाँ पांडवों के वक्त की इमारतें हैं। ऊँचे टीले हैं। मूर्तियाँ भी निकलती हैं। जशपुर को, कहते है कि कुमाऊँ के राजमंत्री यशोधर जोशीजी ने बसाया था। यह एक छोटा-सा नगर है। काशीपुर से ८, मील दूर है। १८५६ से यहाँ पर टाउन ऐक्ट लगाया गया। यहाँ कपड़ा बनता है। छपाई का काम भी अच्छा होता है। जशपुर तराई नहीं कही जाती। यहाँ की आबहवा अच्छी बताई जाती है । यह पका इलाका है। अकबर के जमाने में इसका नाम सहजगीर था।
काशीपुर
तराई-इलाके का सबसे प्रसिद्ध व पुराना शहर काशीपुर है। लोक-विदित चीनी यात्री ह्यूनसांग यहाँ आये थे। उन्होंने काशीपुर के बारे में जो कुछ लिखा है, उसका सारांश हम यहाँ पर कनिंघम साहब की पुस्तक से उद्धत करते हैं - "मादीपुर से चलकर वह (ह्यूनसांग) ६६ मील की दूरी पर गोविषाण नामक स्थान में पहुँचा। यह राजधानी २१/२ मील की गोलाई में थी। यह ऊँची भूमि पर थी। इसकी भूमि मज़बूत थी। वहाँ कठिनता से पहुच सकते थे। वह स्थान बगीचों, तालाबों तथा मछली के कुंडों से घिरा था। वहाँ दो मठ थे, जिनमें १०० साधु बौद्धधर्म के थे। ३० ब्राह्मणी धर्म के मदिर भी थे। शहर के बाहर बड़े मठ में २०० फुट ऊँचा अशोक का स्तूप था। यहाँ बुद्धदेव ने लोगों को धर्म का उपदेश दिया था। यहाँ दो और छोटे छोटे स्तूप थे, जिनमें बुद्ध भगवान् के नख व बाल थे।
विशप हेबर ने लिखा है- काशीपुर हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ है, जिसको परमात्मा ने ५००० वर्ष पहले बनाया। यह बात गलत है, क्योंकि काशीपुर को सन् १७१८ (१) में कुमाऊँ के राजा देवीचंद के तराई के लाट श्रीकाशीनाथ अधिकारी ने अपने नाम से बसाया। पुराना किला उज्जैन कहलाता है। इसके निकट द्रोणसागर है। यह सागर किले से पहले का बना है। अब भी यह इसी नाम से पुकारा जाता है। अब भी यहाँ यात्री आते हैं। इसे पांडवों ने अपने गुरु द्रोणाचार्य के लिये बनाया था। यह ६०० फुट के लगभग चौकोर है । गंगोत्री जाने पर यात्री यहाँ आते हैं। इसके किनारे सती नारियों के स्मारक हैं। इस किले की दीवारे ३० फुट ऊँची हैं। ईटें इसमें १५" १०" २१/२" की हैं। ६०० फुट किले के इधर ज्वालादेवी हैं, जो उजैनीदेवी भी कह जाती हैं। यहाँ चैत्र के महीने में मेला लगता है। भूतेश्वर, मुक्तेश्वर, नागनाथ, जागीश्वर नाम के मंदिर हैं, जो शायद बाद को बने है। यहाँ पर एक टीले का नाम भीमगदा हे, जो शायद महादेव का लिंग हो।
यहाँ पर एक महल के खंडहर दिखाई दिये। १४-१५ खंडहर मंदिरों के दिखाई दिये, अर्थात् उनके आधे, जितने ह्यूनसांग ने लिखे हैं। बड़े बौद्ध-स्तूपों के चिहन दिखाई दिये, सिर्फ इसके कि जागीश्वर महादेव के पास एक २० फूट ऊँचा ईटों का टीला दिखाई दिया। जो उन बड़े स्तूपों के समान नहीं हो सकता, जिनका जिक्र ह्यूनसांग ने किया था, यद्यपि ये स्तूप बौद्ध-स्तपों के समान हैं।" यद्यपि श्रीकनिंघम साहब को ाह्यूनसांग के लिखे-मुताबिक ठीक-ठीक चीन न मिली, और इतनी मुदत बाद मिलतीं भी कैसे? तथापि उन्होंने जो उपयुक्त अन्वेषण ह्यूनसांग के लेख का किया, उसमें उन्होंने कहा है कि गोविषाण वह जगह थी, जहाँ पर अब काशीपुर बसा है। वहाँ बुद्ध भगवान् आये थे, और उन्होंने धर्मापदेश दिया था। ऐसा ह्यूनसांग ने लिखा है।

गोविषाण के उत्तर में ब्रह्मपुर या ब्रह्मपुरा राज्य था। यह शायद कत्यूरी राजाओं का राज्य था। ह्यूनसांग लखनपुर तक गये हैं, जो ब्रह्मपुर राज्य की राजधानी था। ह्यूनसांग छठी शताब्दी में यहाँ आये। लगभग १६ वर्ष यहाँ रहकर सन् ६४५ में चीन को लौटे।
काशीपुर की ज्वालादेवी को इस समय बालसुंदरी देवी कहते हैं। इसके पास गुसाई का टीला है। यहाँ तालाब व बगीचे अब भी बहुत हैं। यहाँ की आबादी १५,००० के लगभग थी, अब १२,००० है। यहाँ १७ मुहल्ले हैं।
कूर्माचली ब्राह्मणों में पंत, पांडे, जोशी, भट्ट, लोहनी आदि प्रायः कुमाऊँ से जाकर वहाँ बसे हैं। वे चंदों के राजकर्मचारी थे। कुछ राजा लालचंद के खानदान के कारवारी रहे। अब भी प्रतिष्ठित पदो पर हैं। इनके अलावा चौबे खानदान वहाँ का बहुत पुराना व सम्मानित है। खत्री व अग्रवाल वैश्य भी बहुत धनी व सम्माननीय हैं। खत्रियों के हाथ में कपड़े की तिजारत है। कारतने भी धनी-मानी हैं।
सन् १८७२ से यहाँ पर म्युनिसिपैलिटी की स्थापना हुई। सन् १९१५ में उदयराज व जगतलक्ष्मी हाईस्कूल की स्थापना हुई। जिसके बनाने में रानी जगतलक्ष्मी ने १००००) नकद दिये, और राजा उदयराजसिंहजी ने एक गाँव भी दिया। नगर के लोगों ने चंदा भी दिया। इसके बनवाने में पं० गोविन्दवल्लभ पंत तथा श्री मुकुन्दराम जोशीजी ने खुब प्रयत्न किया। यहाँ पर एक टाउन स्कूल भी है। चुंगी के भीतर अनिवार्य शिक्षा का भी प्रचार है।
श्रीकनिंघम ने इसके बसने की तारीख ग़लत दी है। इसे सन् १६३९ में नये सिरे से कुमाऊँ राज्य के लाट श्रीकाशीनाथ अधिकारी ने बसाया। उसके बाद उनके पुत्र या पौत्र (?) श्रीशिवनाथ अधिकारी सन् १७४४ तक या के लाट थे। सन् १७४५ में पं० शिवदेव जोशीजी ने काशीपुर में किला बनवाया और पं० हरिराम जोशोजी को लाट व बक्सी (सेनापति) बनाया। उनके ठीक काम न करने पर श्रीशिरोमणिदास को लाट बनाया। उनके बाद उनके पुत्र श्रीनंदराम व श्रीहरगोविन्द बारी-बारी से लाट हुए। इन्होंने नवाब अवध से संधि कर ली। कुमाऊँ के राजा से विश्वासघात किया। अंगरेजों के आने पर सन् १८१४ में राजा शिवलाल, जो हरगोविंद के पुत्र थे, यहाँ के शासक व जमींदार के किले में रहते थे। राजा शिवलाल ग़दर में मारे गये। इनकी रानी भवानी सती हुई। इनके नाम से रानी-भवानी-मठ भी है।

काशीपुर नरेश के पुरखे पहले रुद्रपुर के किले में रहते थे। सन् १८४० में पांडे जमींदारों से जमीन लेकर उन्होंने यहाँ कोठी बनवाई। राजा शिवराज सिंह जी से प्रतापी पुरुष हुए हैं। राजा-प्रजा दोनो में उनका सम्मान था। सन १८५७ के गदर में उन्होंने सहायता दी। इससे सी०आई०ई० की उपाधि पाई। वह बड़े लाट की कौंसिल के मेम्बर भी थे। उनका महल जो तालकटोरा के पास था और उनका बाग, जो महल के पीछे था, देखने योग्य थे। विजयादशमी को गद्दीनशीन नरेशों की तरह उनका जुलूस निकलता था। उनके नाम से अल्मोड़ा की शिवराज-संस्कृत पाठशाला अब तक विद्यमान है। वर्तमान अस्पताल भी आपकी ही उदारता से बना।
कुर्मांचल के प्रसिद्ध कवि श्रीगुमानी पंतजी काशीपुर में पैदा हुए थे। उन्होंने काशीपुर नगर का वर्णन बड़ी रोचक भाषा में किया है-
कथावाले सस्ते फिरत धर पोथी बगल में।
लई थैली गोली घर-घर हकीमी सब करें।।
रंगीला-सा पत्रा कर धरत जोशी सब बने।
अजब देखा काशीपुर शहर सारे जगत में ।।१।।
जहाँ पूरी गरमा-गरम, तरकारी चटपटी।
दही बूरा दोने भर-भर भले ब्राह्मण छकें।
छहे न्यौतेवारे सुनकर अठारे बढ़ गए।
अजब देखा काशीपुर शहर सारे जगत में॥२॥
जहाँ ढेला नही ढिग रहत मेला दिन छिपे।
जहाँ पट्ठी पातुर झलकत परी-सी महल में।।
तले ठोकर खाते फिरत सब गब्रू गलिन में।
अजब देखा काशीपुर शहर सारे जगत में॥३॥
कदो जसपुर पट्टी फिरकर कदी तो चिलकिया।
कदी घर में सोते भर नयन भोरे उठ चले।।
सभी टट्ट लादें बनज रुजगारी सब बनें।
अजब देखा काशीपुर शहर सारे जगत में॥४॥
यहाँ ढेला नदी उत बहत गंगा निकट में।
यहाँ भोला मोटेश्वर रहत विश्वेश्वर वहाँ।
यहाँ संडे दंडे कर धर फिरें साँड उत ही।
फरक क्या है काशीपुर शहर काशी नगर में||५||
तराई का इतिहास
कत्यूरी राजाओं का अधिकार तराई में था, यह बात निर्विवाद है। ह्यूनसांग ने गोविषाण राज्य का जिक्र किया है, पर ऐसा नहीं लिखा है। कि वहाँ का राजा कौन था। किन्तु यह लिखा है कि वहाँ कोई शासक रहता था, राजा अन्यत्र रहता था । राजा पर्वत में रहते थे, और उनका प्रतिनिधि या लाट काशीपुर में रहता था। गानेवाले 'जगरिए' (एक किस्म के भाट) कहते हैं- "आसन बाका बासन वाका सिंहासन वाका वाका ब्रह्म वाका लखननपुर।
इस पद में ब्रह्म व लखनपुर राजधानी का जिक्र आया है। ब्रह्मपुर राज्य कत्यूरियों का था। लखनपुर उसकी राजधानी थी। यह लखनपुर पाली पछाऊँ का लखनपुर होगा। यह गोविषाण (काशीपुर) के उत्तर में है। ह्यूनसांग के नक़्शे में यही दर्शाया गया है। लखनपुर गरमी की राजधानी और जाड़ों की राजधानी ढिकुली थी। पर उन राजाओं की बातें ज्यादा ज्ञात नहीं। विशेष वर्णन 'कत्यूरी-शासन-काल' में मिलेगा।
नैनीताल के श्रीनेमिल साहब के गजेटियर में लिखा है-"मुसलमान साम्राज्य की नीव पड़ने के समय कुमाऊँ-राजा तराई के स्वतंत्र अधिकार में थे। देश के किसी राजा के मातहत न थे। अतः इस बात में शक नहीं कि तराई में कत्यूरी राजाओं का अधिकार था ।" पर्वतीय लोग अनन्त काल से जाड़ों में तराई भावर में उतरते रहे हैं। तराई भावर बहुत कुछ उन्हीं कीआबाद किया है। कत्यूरियों के समय में तराई बहुत आबाद थी। उस जमाने के स्तम्भ व खंडहर बहूत दिखाई देते हैं।
पर तराई भावर की आबादी का विशेष वर्णन हमको १५वीं शताब्दी से ज्ञात है। १६वीं शताब्दी में यहाँ बहुत आबादी थी।
कठेर उर्फ़ रोहिलखंड
कठेर उर्फ रोहिलखंड से तराई का इतिहास मिला है। रोहिलखंड का पुराना नाम कठेर था। वहाँ पर बड़ा जंगल था। अहीर लोग रहते थे। बरैली का नाम उस वक्त टप्पा अहीराँ था। वहाँ के मालिक अहीर थे। ये जबरदस्त लड़ाके थे। जब तैमूर के हाथ भारतवर्ष आया, तो उसने तिरहुत के राजा खड़कसिंह और राव हरीसिंह को इन्हें दबाने को भेजा। ये राजा कठेर जाति के थे। अतः इनके नाम से यह प्रांत कठेर या कठेड़ कहलाया। बाद को रोहिलों के आने से यह रोहिलखंड कहा गया। कठेरों में से कुछ लोग माया, सरल, काठ व गोला में बसे। पहले शाहजहाँपुर का नाम काठ व गोला था। बाद को बादशाह शाहजहाँ के नाम से शाहजहाँपुर कहलाया। कुछ लोग चौपला में बसे, जो शाहजहाँ के पुत्र मुराद के नाम से मुरादाबाद कहा गया। कठघर जो अब कहलाता है, वह कठेर का ही दूसरा रूप है। क्योंकि वहाँ राजा नरपतिसिंह कठेरिये रहते थे। कठेरी राजपूतों में दो भाई वासुदेव व बरलदेव हुए, जिनके संयुक्त नाम से बाँसबरेली नाम का नगर बसा। कठेरी राजपूतों की राजधानी लखनौर में थी।
कठेरिया राजा खड़गू ने सन् १३८० में बदायूँ के नवाब सैयद मुहम्मद दीन को कार डाला। तब सुल्तान फ़ीरोज़ तुग़लक के चढ़ाई करने पर वह तराई को भागा। वहाँ कुमाऊँ के महतों ने उसकी सहायता की। १४१८ में सुलतान ख़िज़्रखाँ ने राजा हरीसिंह को हराकर रामगंगा के पार भगा दिया, पर पहाड़ों के डर से वह लौट गया। अतः नीचे के मुसलमानों के सताये जाने पर कठेरिये राजपूतों ने तराई में शरण लेनी चाही, और उसे दबाना शुरू किया। सन् १३६७ में राजा गरुड़ ज्ञानचंद दिल्ली-दरबार में गये, और सुल्तान से कहा कि तराई-प्रान्त कदीम से कुमाऊँ के राजाओं का रहा है, उस पर उन्हीं का अधिकार होना चाहिए।
सुल्तान ने उनकी बड़ी खातिर की, और गंगा तक का प्रान्त कुमाऊँ के राजा को दे दिया। कुछ दिनों बाद संबल के नवाब ने तल्ला देश भावर को छीना, पर वीर सेनापति नीलू कठायत ने मुसलमानों को वहाँ से मार भगाया। राजा कीर्तिचंद ने सन् १४८६ में काशीपुर परगने में जसपुर के पास एक किला बनवाया और उसका नाम कीर्तिपुर रक्खा। सन् १५६८ में काठ व गोला के नवाब हसेनखाँ टुकड़ियों ने तराई भावर पर अधिकार किया, पर वह पहाड़ों में न गया। उस समय कुमाऊँ का राजा बड़ा धनी गिना जाता था। उसका राज्य-विस्तार तिब्बत से लेकर संबल तक था, ऐसा 'फिरेश्तो' नामक इतिहास में लिखा है। मुसलमान इतिहासज्ञों ने तराई भावर को 'दामन-कोह' या 'दामन-ए-कोह' के नाम से संबोधित किया है। कहा जाता है कि एक बार अकबर के सेनापति सुल्तान इब्राहीम ने इसको जीता था।
श्रोत: "कुमाऊँ का इतिहास" लेखक-बद्रीदत्त पाण्डे,
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