
-:कुमाऊनी संवाद:-
लेखिका: अरुण प्रभा पंत
"तौ बजारन कतु कौतिक जौ लाग रौ।" "बाबू तुमूल गरुड़ और हल्द्वाणिक बजार देखी भै। यो मुंबई भौय, दुनियौक एक ठुल शहर यां कि बातै कुछ और भै।" "मैं समझुं चेला, तेरी इज कं देखणैक शौक छी पर उ बिचारि के नि देख सकि, अल्मांड़, हल्द्वाणि और हरिद्वार,बस। यां ऊंल कुछ दिन रूंल देखुन सोच बेर अफुलि रैछी और फिर ---।" "आब के कर सकनूं , तुम आब म्यारै दगाड़ रौला जां तुमौर देखणौक मन होल, तुमन कं मैं घुमूंल बस मकं बतै दिया या जां मैं जूंलतुम म्यार दगाड़ रौंला।बस मकं टैम हैयी चैं।"
"आब यकलै मैं गौं में कां रै सकनूं, त्यार इजैक सहारैल कटणै छी। पर सालेक में मकं पहाड़ आपण गौं देखाते रै और के नि चैन।" "बिल्कुल पुर परिवार दगै नानतिनन कं आपण जाग ठौर देखूंल ,आपण जड़न दगै पछ्याण करणै भै।" यो बाबू के चहा पाणि पिंछा? पहाड़न में जो ग्वाल, नारियल पुज में ब्याकाजन में तुमुल देख राखौ नै वीक भितेरौक पाणि पिछां, फैद(फायदा) करूं तीस(प्यास) लै नि लागैनि।
चल पेवा (पिला) देखनू कस हुं धौं।(देखूं कैसा होता है)।
कठिन शब्द देखिए :-
१. भितेरौक--भीतरका
२. पिछां--पियेंगे
३. ब्याकाजन--शादी विवाह में
४. तुमूल--आपने
५. परिवार दगै--परिवार के साथ
६. गौं देखाते रै--गांव दिखाते रहना
७. सालेक में--सालमें
८. जूंल--जाउंगा
९ म्यार दगाड़--मेरे साथ
१०. घुमूंल--घुमाउंगा
११. अफुलि रैछी--बहुत खुश थी या खुशी में इतरा रही थी
१२. बजारन--बजारों में
१३. कौतिक--उत्सव, मेला
मौलिक
अरुण प्रभा पंत
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