
-:कैसी रूंछै इजा:-
लेखिका: अरुण प्रभा पंत
हिट म्यार दगाड़ लगा ताव क्वे न्हां यां
बसंती काखि, गोबिंदी बुब,चंपा इज
सब न्हैं गेयीं त्यार दगड़ू एक साबुलि दी भै यां
कां जालै ज्यून तेरिआस त्योर तराण
न यां दवाय नै पुड़ी न छु क्वे मददगार
कैसी छाड़ू चेला हमर पांच पीढ़ी गोर
तैक बुढ़ि आमकं त्यार बुड़ बड़बाज्यू
ल्याछी, तौ गोर हमौर घरौक निशाण
यो सबै केन के काथ, कुनी मैंथै बलानी
तेर बाबु लगैई अलबखर पुलमौक बोट
तेरआमौक तुलसी बृंदावन सालीग्राम
दाढ़िमा'क बोटाक जाड़ थैं त्योर पढ़न
त्यारआपण दिद दगै लुकी बुड़ी खेलण
दाणि, बाग-बाकरि, गिडु खेलण छु मकं फाम
यो घर दगै म्योर पिरेम उकं कां धरुं
नि छाड़ीन यो गौंक पाणि, हौ, गोठ माव
मैं के न्हांतू इजा तेर, म्यार दगै हिट धैं
द्विदिन में सब गोर बाछ बेच लगूं ताव
त्यार सब जर्वत करूंल पुरि मोह छाड़ यांक
केन्हां यो ढ़ुंग पाथरन में आब हिट तु
त्यार बसौक यांक जीवन नि रैगोय
बाघ, बानर, सूंगर दिनमान भर तौयाट
के हैगोय रातै-रात ककं लगाली धाल
नजीकै कि बसंती काखि लै न्हांआब
आब तु आपणि मनैकि छाड़ हिट दे
होय पै जस कूंछै तसै करूंल पोथा
तु म्योर च्योल मैंलै तेरि इज छूं च्याला
द्वि दिन मांथ जब गोर-बाछ बेचि ग्याय
भोल रत्तै जाण छु इजा रत्तै उठ जूंल
होय मकं छु पत्त मैं पुर करुल तेरि बात
जब रत्तै च्योल उठ सामान भौय बांदि
लागौ उठूण इजकं इज कथ्थप पुजि भै
हाय इजा तुतो न्हें गेछै निछाड़ त्वील
यैं रै गेछै आब मैं आपण भौ थैं के कूंल
को शुणाल उकं आण, काथ क्वीड़
त्वील म्यार नानतिनन कं
के नि सिकाय इजा उं आब अधुरै रैग्याय।
मौलिक
अरुण प्रभा पंत
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