
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
बँणका्ट , बँण्याठ
बौस , कुटयो्ल
दातुल और
हव - भा्न ......
सुद्दे जि बणिं जानीं
आफर में
"लु" लाल करण पड़ौं
घाँणैंलि
चोट मारी जैं
खूब पट्पटायी जा्ंछ
तब जै बेरि
"धार" बंणैं .....
यसी कै
उज्या्व ले हुँछ
रात ब्याँण जांणैं
जैंङिणी
सूर्ज कैं
मतूँण मैयी रुनीं ....
तब जै बेरि
लाल भौ जस
भ्यार निकवौं .......
यसी कै
बखत
खाल्ली जि
पल्टौल कै हैरौछै ....
छिलुक ल्ही बेरि
हिटण पड़ौल .....
सरग'क ता्र
लुछण तैं
दिन - रात
एक करण होलि ....
मनसुप लगै बेरि
के नि हुन ....
तड़िन में फूक और
ख्वा्र " पीड़ "
जरुरी छ .......
पेट त
दुन्नी में कुकुर ले भरौं
तु
मैंस छै ......
भुला ! तु मैंस छ।
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उज्या्व दिनां त
सबै आपण हुँनीं
अन्या्र में क्वे
छियूल ले नि दी।
खाप
देखी जैं
भतेर
को देखों।
भाँग 'क ल्वा्त ....
उसी त के नि भै
मगर , ज्यौड़
जत्ती समायि राखौं।
तु कतुकै
"मो्स" लगा
चिमड़ी मूँख
उसो रौल .....
रंगत
भतेर हुँछि।
शब्दार्थ:
बँणका्ट से हव-भा्न तक सब खेत व घरेलू औजार हैं।
आफर - भट्ठी,
लु -- लोहा ,
जैंङिणी -- जुगनूँ,
मतूँण -- पटाना,
पल्टौ्ल - बदलेगा,
छिलुक - रोशनी करती लकड़ी, मशाल,
लुछण - नोचना ,
मनसुप - बेकार का ध्यान, मनन
तड़िन में फूक - पैरों में दम,
बरमान - दिमाग
खाप - बातें,
ल्वा्त - भाँग पेड़ों की छीलन, जिसे बट कर रस्सी बनती है।,
ज्यौड़ - रस्सी,
जत्ती - जवान भैंसा,
समायि - कट्रोल करना,
मो्स - हेयर डाई,
चिमड़ी - झुर्री,
रंगत - उमंग
शब्दन'कि गलती ठीक करि दिया हो
July 15,18, 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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