कै भली छाजी रई हो यौं जुनली रात

कुमाऊँनी कविता-कै भली छाजी रई हो यौं जुनली रात, यौं ठंडो ठंडो हव भ्यी, यौं ठंडी ठंडी रात Kumaoni Poem describing beauty of hills in moonligh

कै भली छाजी रई हो यौं जुनली रात
रचनाकार: दीपाली सुयाल

कै भली छाजी रई हो यौं जुनली रात
यौं ठंडो ठंडो हव भ्यी, यौं ठंडी ठंडी रात

यौं माह बैशाख भ्यो, भ्यो रूढ़िक दिन चार
काटी हली ग्यू या पाकी, गो यौं काफल रसदार

चूल्हक रौट हैछी, हैछी कधिन सिंसौडिक साग
छोड़ धैगी सब गौ क, अकेलो रै गो यौं पहाड़

लाल मटल लिपि भई कधिनी यौ धेई द्वार
लिखी इजन गेरूवल कै भली छाजछी यौं धेई द्वार

खेत सब उजाड़ हैगी, खंडर पड़ी गो यौं पहाड़
दयू चार मैस भ्यी ऊ ले है गई सब बेकार...

इष्टो की छाया भ्यी भ्यो बुड़ बाड़ियोक आशीर्वाद
जी रया जाग राय भेंटने रया अपण घर द्वार...

दीपाली सुयाल-Dsuyal, 09-05-2020
उत्तराखंड रामनगर

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