
"गरूड़ में ह्यौं"
कुमाऊँनी कविता
रचनाकार: मोहन चन्द्र जोशी
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
गरूड़ में ह्यौं पड़ पन्नर दिसम्बर द्वी हजार चउद क् सन्।
तार् अगास दिश् जब खुलणाँछी उज्याव हण तलै अगास चम्म।।
नैं स्याव कुकुरों कि क्वे हलचल नैं गाजि बाकरा कि डुबन।
अणकस्सै गरूड़ में चिताइण रौछ इदु ज्यादे ह्यौं पड़न।।
रत्तै ब्याण बटि बादल गर्जा घोर घननघनघन।
रूवाक् फूल जसा झड़नैं ह्यौं उड़ानैं औंण भिपन।।
अरे अगास बटि गुफाव् उड़ानैं छुटणीं इफन उपन।
भुलि गो पाँणी आज अरड़ि में डोबी जास् हण टोपण।।
हनैं हनैं गब गब भरी ह्यौं ल् बोटों में भई टॅंण-टेंण।
बोट ढवा टुटि हाँङ - फाँङ जागि जागि य बण और उ बण।।
आज हाँजरी ह्यौ़ लै च्यापिया केली ह्यौं ल् दाबिण।
आज रंग सब एक्कै रंग में लुकि गे रीस पसिण।।
घुन घुन तक तलि तलि देखियछ कमर कमर मलिपन।।
डाँन हिमाव जास् सब बणि गींना चाँदी जस फोकी भिपन।।
काँ चाड़ पोथील बह-गोरू हिटण रीं खसखस लूणनि रड़न।
नानतिन ज्वान ढिन बड़ै उछावण रीं नि चितौंना आपुं में पड़न।।
बुड़ घ्याव मिठि हाव् सुङि - सुंङि काँमनैं फूक मारनीं चुलन।
दिराँण हैं ढ्यस मारि आज जिठाणीं कैंछ हवे ! भट भुटनीं कन्।।
सासू की खिंण खिंण हरै गे सौरै की गनगन।।
चुड़भन्न हई य रात में सब आपण दिसाँणों में गुनमुन।।
बिन जूनकि लै जून जसि य रात रोजै किलै नि हन ?
झिट् घड़ि में सबै जबाब दि ग्याय् सब विज्ञानाक् साधन।।
फिर जिन्दगी हराण जसि भैगे मनसुपा में कथपन।
आब् झन् कये गरूड़ में डावै ऐं मोहना ह्यौं कभैं नि हन।।

................................................................
मोहन जोशी, गरुड़, बागेश्वर। 02-02-2016
0 टिप्पणियाँ