के करण चाणौ तौ?

कुमाऊँनी कविता- मैंसन् एकबट्यै जुड़ैलि जमात, आपण बोलि भाषैकि लागलि धात, आब् झन् पुछिया के करण चाणौ तौ? Kumaoni Poem our culture and language

🌷🥀के करण चाणौ तौ?🌴🌺
रचनाकार:  प्रकाश पाण्डेय
🤓🏵🌺🙏🕉🏵🌺🎁😷🦂🐢

🙏🌹कुमाऊँनी भाषाक् विकासाक् लिजि🌹🙏

घाघरौक् फ्योट् पाड़ि राखौ,
मोट ज्यौड़ कमरन बादि राखौ,
दातुल् में पयै धाऽर लगे राखी,
गौं बै घस्यार बाट् लागि रै छ,
मैंस पुछनी के करण चाणै तौ?

सुकिलि सुराव सुकिलै कुर्त छ,
काइ फतोइ सुकिलि टोपि लै छ,
कपावन पिठ्या कानिम हुडुक,
हुड़की दगाड़ सब हुंगुर लगुणईं,
पुछणईं उथणि के करण चाणौ तौ?

छुणमुण छुणमुण घुँगुर बाजणईं,
दमुवा रौटि में चोट हाणनईं,
बीनबाज् रणसींग तुतुरि बाजणै,
घर बटिक् बर्यात बाट लागणै,
देखो धैं पुछनी के करण हूँ जाणौ तौ?

कांसैकि थाइ में अंटांव चलि रईं,
दुलैंच सजै बेर डंगरी भैटि रईं,
मैंस आपणि पूछ करण लागि रईं,
जगरी उनार् जबाब दिण् लागि रईं,
फिर लै पुछनी के करण् चाणौ तौ?

पढ़ी लेखी मैंस दगाड़ भैटाल् जब,
आपण मनाक् सवाल उठाल सब्,
मैंसन् एकबट्यै जुड़ैलि जमात,
आपण बोलि भाषैकि लागलि धात,
आब् झन् पुछिया के करण चाणौ तौ?
🙏 प्रकाश पाण्डेय, हरिद्वार 🙏

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ