
बुड़ज्यू
रचियता: राजेंद्र सिंह भंडारी
हमारी देवभूमि का एक इकलौता बेटा अपनी शादी के तुरन्त बाद रोजी रोटी के चक्करों में शहर में आ जाता है। कुछ समय पश्चात अपनी मां से फोन पर अपने पिता जी की खबर पूछता है। प्यार एवं गुस्से से भरी मां क्या जबाब देती है! उसको निम्नलिखित कुमाऊँनी गीत के माध्यम से दर्शाने की कोसिस की है।
अपनी भाषा में मैंने बेटे के पिता को “बुड़ज्यू के नाम से सम्बोधित किया है।
मां बेटे से कुमाऊँनी भाषा में
जब बटी डिश टीवी च्यला, अरौ ब्बारी मैत बटी।
रिमोट लिभेर हाथों में, पसरी जानी बुइज्यू।।
राति ब्याण चार बाजी बै, भजन कीर्तन सुड़ी।
पूरा, भक्ति के सागर में, उतरी जानी बुड़ज्यू।।
धार्मिक चैनलों पर, देखी भीड़ पंडितों की।
चारपाई बटी सोफा पर, सरी जानी बुड़ज्यू।।
हत्या और डकैती की ऊँ, सुड़नी बहसा जब।
न्यूज चैनलों के देखी, डरी जानी बुड़ज्यू।।
कटरीना कैफ की च्यला, देखनी फिलम जब।
हमारा संस्कारों बै, बिखरी जानी बुज्यू।।
जी और कलर प जब, सैड़ियों नाटक देखनी।
कोट पैन्ट पैरी भेर, संबरी जानी बुड़ज्यू।।
लिहाजै नी करन च्यला, सफेद बालोंक आब।
जो नी करण छी उलै, करी जानी बुज्यू।।
के ल्याखै नी लगौन आब, हम लोगों बुलाड़ कड़ी।
पुरा बदतमीजी में, उतरी जानी बुड़ज्यू।।
आठ दस चाहा पीनी, नौन वैज ल्याओ कौनी।
काम काजी क नाम पर, लधरी जानी बुज्यू।।
टीवी देखी देखी भेरा, रक्तचाप बड़ी गोछ।
मिकड़ी लागौंछ च्यला, मरी जानी बुड़ज्यू।।
राजेंद्र सिंह भंडारी
फोटो सोर्स: गूगल

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