हल्दौक गांठ और घरैक पुकार

कुमाऊँनी कविता - "हल्दौक गांठ और घरैक पुकार" पहाड़ के वीरान घर - Kumauni Poem about deserted house in Kumaun Hills

-:हल्दौक गांठ और घरैक पुकार:-

लेखिका: अरुण प्रभा पंत

सिल में हल्दौक गांठ फोड़ सब्बै मश्याल धरी
लुस्स-लुस्स पिस हाथैल घैंस-घैंस बेर
मश्यालनौ'क सत्त हाथैल ब्यालन धर
झट्ट मुणी दालौक भड्डू और कढ़ैन
बाड़ौ'क साग भड़-भड़ पाक छौंक दाल
गरम भात दाल टपकी और खट्टै चटकाय
भाजा भाज ख्यातन हुं रोपै लगूण हुं
घुनन जांलै पाणि कच्यारन न्यूण है ठाड़
को जाण सकूं कतु मिहनत और बुति करि त्यार इज बाबनैल
आपण और पुर परवारौक पाय पेट
जब्लै जेलै कर हर बखत नानतिन
आंखन भाय ठाड़, ठुल होला तो भलीकै रौल
के पत्त छी मोटरन बैठ फुर्र है जाल
निआल कभै यो जाग यो पुर्खनैक थात
मैं निस्वासी यो ढुंग पाथरौ'क ढेर
लागौल माव में ताल और ताल में जंग।

यो देखौ तावा'क छेद भितेर यो लगिला'क फांग फुटण बैठ
को कौल यो घराक मैसन थैं फामें फाम रैगै
मैं पुर घर छुं अबोल पाथर नै, म्यार मन में
नरै निस्वास माय और नानतिननैक चायपाति
मकं लै पत्त छू उ धुर्तोय उ उजाड़
म्यारै आड़ में तु लुक जां छिये घुर्र-घर्र
करआपण पाठ याद, बलानै रुंछिये
कां गोछै भाऊ आब ऊंछै लै तो यां नि रुनै।
रुक छै कथ्थप गैस्ट हाऊस पन
एक बार मकं देखजा पलास जा
पत्त नै आब यो चौमास में, मैं उधर जूंल पुर्रै।

मौलिक
अरुण प्रभा पंत 

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