'क्वे गुसैं न ग्वाव'

कुमाऊँनी कविता-कांबै मनुनू अषाड़क हरयाव, भाजण नि रौय माज्यत, करोना बयाव। Kumauni Kavita affect of covid-19 on lifestyle

'क्वे गुसैं न ग्वाव'

रचनाकार: दिनेश जोशी*
व्यंग्य-विनोद

कांबै मनुनू अषाड़क हरयाव,
भाजण नि रौय माज्यत, करोना बयाव।

काम धन्धैकि भलि हैरै तनैरि छुट्टी
डिकार जा भै रई,सबनाक घरवाव।

जिबैड़िक स्वाद में के कमी न्हांति
चैन हैरो सबूंकै खीरक भद्याव।

पड़ रई भिसूण जास दिसाण में चाऔ
'खुलि गे दुकान' सुणौ,बुड़ ज्यू हैगी छाव।

कां हराणी,हई,बल्द,कांहू गो नस्यूड़
बांजि सारि में के चांछा,नीस-इचाव।

मलि बटी और्डर ए जाणी,कागजों में
तली वालनैकि मुशीबत छु,ऐ रै गाव-गाव।

ऐ गोछी भाजि बेर,घरपनाहूं पोर-बेली
लौटण फैगी नानतिन बिचार,फिर देशनाक ताव।

रोजगारैकि चिन्ता सतूण भैगे उनन कणि
यां क्वै नि पूछणी चानी, क्वे गुसैं न ग्वाव।


 -----------------@ दिनेश जोशी* 17-07-2020
 



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