उ दूर बोटाक डाय में


-:उ दूर बोटा'क डाय में:-

(वह दूर पेड़ की डाल में)
लेखिका: अरुण प्रभा पंत

मैल चाख बै भैर चा दूर एक बोट में
चाड़ बैठ लागणौ छी सभा करनैयी
हौ चली भै कभै मंद कभै औरी तेज
लागौ झुल झुलणयीआनंद मनूणयी
कभै तल्कै कभै मल्कै पर मजबूती में
देख तननकं तनर मौज कं मैलै भैर ऐयूं
तबै बाज झप्पआ चींची शुणी मैल हौ
सब रंग में भंग, सबनौक जीवन सार
जब जांलै ज्यून छां हर्ष में रूण चैंहो
तबै द्योक झड़िल भिज्यूं भितेर उनै रैयूं
पर बरमाण्ड में कल्ज में चींचीं शुणु
फिर बुति धाणि लाग्यूं एक दिन सबै
सबै जाल आपण धाम सोचण लाग्यूं
जब आल टैम केन के नियर होलै हो
धक-धक छु जब तक तबै तक तौ माय
तु मेरि इज उ म्योर च्योल चेलि यां भाय
किलै नै हम हर बखत रूं खुश-हर्षित

मौलिक
अरुण प्रभा पंत 

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