श्रीमद्भगवतगीता - कुमाऊँनी भाषा में अट्ठारूं अध्याय (श्लोक ७० - ७८)

कुमाऊँनी भाषा में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्, interpretation of ShrimadBhagvatGita in Kumauni Language

कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्

 अट्ठारूं अध्याय - श्लोक (७० बटि ८ तक)

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।७०।। श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।७१।। कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कश्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टते धनञ्जय।।७२।। कुमाऊँनी:भगवान् ज्यु कुनई कि, मैं घोषित करनूं कि जो हमर् यौ पवित्र संवाद कैं अध्ययन (पड़ौल् या मनन ) करौल् ऊ अपणि बुद्धि द्वारा मेरि पुज करौल्। जो श्रद्धा सहित यौ संवाद कैं द्वेषरहित है बेर् सुणौल् ऊ शुभ लोकन् में जां पुण्यात्मा निवास करनीं कैं प्राप्त हौल्। हे अर्जुन! तुमूल् यौ संवाद एकाग्रचित्त है सुणौ, आब् बताओ कि तुमर् अज्ञान या मोह दूर हौ छ् या नैं? (अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि, यौ गीता शास्त्र यतुक् शुद्ध या पवित्र छू कि जो श्रद्धा पूर्वक, शुद्धता पूर्वक और बिना द्वेषै येक् पाठ करौल् या अधिकारी मनखि कैं पढ़िबेर् सुणाल् और ये पार् मनन करौल् त् ऊ पुण्यात्माओं क् लोकन् कैं निस्सन्देह प्राप्त हौल्।)

हिन्दी= मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता है। और जो श्रद्धा समेत द्वेषरहित होकर इस गुप्त ज्ञान को सुनता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है, और उन शुभ लोकों को प्राप्त हो जाता है, जहाँ पुण्यात्माएँ निवास करती हैं। हे पृथापुत्र! तुमने इसे एकाग्रचित्त होकर सुना तब क्या तुम्हारा अज्ञान और मोह दूर हो गया है?

अर्जुन उवाच  -
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्यमाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव।। ७३।।
सञ्जय उवाच  -
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रोषमद्भुतं   रोमहर्षणम्।।७४।।
व्यासप्रसादाच्छुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।।७५।।
रजन्संस्मृत्य संस्मृत्यसंवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।७६।।

कुमाऊँनी:
अर्जुन कूंण लागौ कि- हे भगवान! आब् म्यर् मोह दूर है गो, तुमरि किरपाल् मेरि स्मरण शक्ति लै वापिस ऐ गे, आब् मैं संशय रहित और दृढ़ छूं और तुमर् आदेश क् अनुसार कर्म करैहैं तत्पर छूं।  तब सञ्जय कूनीं कि- यौ प्रकारैल् मिल् कृष्ण और अर्जुन इन द्वी महापुरुषों कि बात सुणी।  ओहो! यौ संदेश कतुक् अद्भुत छु कि म्यर् शरीर में येकैं सुणिबेर और समजि बेर् झुरि-झुरि जसि हूंण लै रै।  व्यास ज्यु कि किरपाल् मिल् यौ गुप्त बात साक्षात भगवान् योगेश्वर श्रीकृष्ण ज्यु क् मुख बटि अर्जुन तैं कूंण बखत् सुणी। और हे राजन्! मीं जब लै इन अचरज भरी और पवित्र बातों क् स्मरण करनूं त् प्रतिक्षण रोमांचित और गदगद् है जनूं।

(अर्थात्  भगवान् ज्यु क् पुछंण पार् अर्जुन कूनौ कि हे भगवान्! यौ गुह्य ज्ञान कैं सुणि बेर् म्यर् भ्रम दूर है गो आब् मैं तुमर् बताई बाट् पार् चलंण ल्हिजी तैयार छूं। उथां सञ्जय ज्यु धृतराष्ट्र तैं कूनीं कि अहो रज ज्यु! यौ जो वार्ता मिल् व्यास ज्यु कि किरपाल् श्रीकृष्ण और अर्जुनांक् मध्य सुणीं, यौ त् अद्भुत, आश्चर्यजनक और पवित्र छू।  मैं जब जब येक् स्मरण करनयू त् म्यर शरीर में झुरि-झुरि जसि है जनै।  जब मनखि भगवान् ज्यु कि शरणागति में निस्वार्थ भावैल् या विशुद्ध मनैल् न्है जां त् ऐस्सी स्थिति है जैं,  फिरि ऊ अपंणि सब्बै महत्वाकांक्षा, इच्छा कैं महत्व दिनैं न्हां और भगवान् ज्यूक् स्मरण में अपंण जीवन कैं समर्पित करि द्यूं तब भगवान् ज्यु वीकि सब बाधाओं क् हरण करि दिनीं।)

हिन्दी= अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! हे अच्युत!  अब मेरा मोह दूर हो गया है।  आपके अनुग्रह से मुझे मेरी स्मरण शक्ति वापस मिल गयी, अब मैं संशय मुक्त तथा दृढ़ हूँ और आपके आदेशानुसार कर्म करने को उद्यत हूँ।  सञ्जय ने धृतराष्ट्र से कहा - इस प्रकार मैंने कृष्ण तथा अर्जुन इन दोनों महापुरुषों की वार्ता सुनी, और यह संदेश इतना अद्भुत है कि मेरे शरीर में रोमाञ्च हो रहा है।  व्यास जी की कृपा से मैने परम गुह्य बातें साक्षात भगवान् योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से अर्जुन के प्रति कही जाती हुई सुनीं । हे राजन्! जब मैं कृष्ण और अर्जुन के मध्य हुई इस आश्चर्यजनक तथा पवित्र वार्ता का बारम्बार स्मरण करता हूँ, तो प्रतिक्षण आह्लादित और गद्गद् हो उठता हूँ।

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरिः ।
विस्मयो मे महान्राजन्सृष्यामि च पुनः पुनः।।७७।।
यत्र योगेश्वरः कृष्णौ यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम्। ७८।।

कुमाऊँनी:
सञ्जय ज्यु कूनीं हे राजन्! भगवान् ज्यु क् अद्भुत रूपक् स्मरण करते ही मैं ज्यादे है ज्यादे आश्चर्यचकित है जनूं और बार बार हर्षित है जनूं।  आब् तुम म्यर् मत सुणौ कि जां योगेश्वर श्रीकृष्णज्यु छनां और जां धनुर्धारी अर्जुन छनां वां ई ऐश्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति और नीति लै निश्चित रूपैल् रौलि, अर्थात् विजय पाण्डवों कि हैलि।
(अर्थात् सञ्जय ज्यु धृतराष्ट्र (जो पुत्र मोह में अंध और अज्ञानी है गो) तैं कुनई कि श्रीकृष्ण ज्यु क् अद्भुत रूप कैं द्येखि और स्मरण करिबेर् मीं आश्चर्यचकित और हर्षित छू, तब मैं अनुमान लगूनूं कि श्रीकृष्ण और अर्जुनांक् होते हुए ऐश्वर्य, विजय और अलौकिक शक्ति त् पाण्डवों क् तरफ्यां ई छू, येक् ल्हिजी जीत लै पाण्डवों कि निश्चित छू।  आब् द्येखण और सोचणैकि बात यौ छू कि सञ्जय और धृतराष्ट्र इन द्वियू लै सम्पूर्ण  गीता ज्ञान सुणौ पर जो बात सञ्जय ज्यु कि समज मैं ऐ गे ऊ ई बात धृतराष्ट्र नि समजि सक्। ये थैं ई कूनीं " विनाश काले विपरीत बुद्धि "।)

हिन्दी= हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण के अद्भुत रूप का स्मरण करते ही मैं अधिकाधिक आश्चर्यचकित होता हूँ और पुनः पुनः हर्षित होता हूँ।  और हे राजन्! तुम यह जान लो कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन है, वहीं ऐश्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति तथा नीति भी निश्चित रूप से रहती है, ऐसा मेरा मत है।

🌹दगणियो आपूं सब्बै स्नेहीजनों क् सहयोगैल् श्रीमद्भगवद्गीता ज्यु क् यौ अट्ठारूं अध्याय आज पुरी गो, आपूं सब्बूं कैं मीं नमस्कार करनूं, धन्यवाद् दिनूं और प्रणाम करनूं ।  भगवान् श्रीकृष्ण ज्यु आपूं सबन् कैं अपंणि किरपा प्रदान करीं ऐसि विन्ति लै करनूं। 

धन्यवाद् जय श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार

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