असली अंध्यारा


असली अंध्यारा

रचनाकार: राजू पाण्डेय

आमा बौलुनै
साँझ पड़ी गै "रज्जु"
धैं ते लालटिनो सिसो साफ कर
सुन
आपनो हाथ लै बचाये
और सिसो लै
कबत्तै रात-अधिरात
भैर-फैर जाना काम उछ
यौ दोसरी बत्ती बातौ लै
धप धप करनोछ्यौ
अत्ति तेल लै खाननोछ्यौ
और पढन बख्त
मुसैनो तेरा नौकै जाननोछ्यौ
बदलिहा मिलै
आज पुरानो पेटिकोटो नाडो मिलो
आमा और आमा कौ जीवन
ऐक लड़ाई छि ऐक जंग छि
कई किस्मा अंध्यारा बठै
रातो अँध्यारो भजूनौ सिखी हालछयो
मिट्टी तेल ना त छिलुकै सही
पर असली अंध्यारा
गौं में अनपढ़ रया मैस
कुपोषित नंनतिना
और इलाज बिना मरनया लोग
जौ देखि
आमा मुख बठै निकली जाछयो
कवै जिन जन्मो ये पहाड़!

बख्त बदलि ग, न आमा रै
न आमा सोच न आमा पीड़
सौ, द्यु सौ वाटा बल्बों पन
न लालटिने जरूरत न बत्ती की
उन गधेरा पन, उन डांडा पन
उन नान ठूला गौं पन
बिजली चमचमाट पन
आमा टैम बठै का
असली अंध्यारा आई लै उसा छन।

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शब्दार्थ :
बौलुनै - बुला रही है। 
अंध्यारा - अँधेरे।
सिसो - शीशा।  
कबत्तै - किसी समय।
भैर-फैर - बाहर। 
अत्ति - ज्यादा।  
लै - भी।
मुसैनो - काला धुँवा।  
मैस - आदमी ।
कवै - कोई।  
उसा - कायम
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~राजू पाण्डेय, 21-07-2020
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