आंगना पाथर

कुमाऊँनी  कविता-आंगना पाथर, poem in kumaoni language about the floor stones of front yard

आंगना पाथर

रचनाकार: राजू पाण्डेय

बरसों बाद खुटा पड़ना आँगन में
एक एक पाथर अहिल्या न्याति सजीव है उठौ
जसै राखी हाली हो राम ज्यूँ लै कदम
यिन उनी खूटा छन जु बरसो पैले
नांछिना दिनभरी उछल कूद करछया आँगन में
आँगना पाथरो में लेखछ्या 
अ आ इ ई, १ २ ३ ४।

कैसे कमेडै लै कैसे क्वैला लै
कभै पिठ्ठू, कंचे, गिल्ली डण्डा खैलछ्या
कभै बैट बॉल घुमु्छया ये आँगन में
कभै ईजा बठै लीपने में लागी जाछ्या
गौरू गोपरा लै, नाननान हाथों लै
आँगन में काई ना जामन दिछ्या

झाड़ पात
एक कुना में बाँधी रुछ्या दूद दिनया गौरू भैसा
और सूखते रुछ्या मड़वा, मादिरो, गौत, भट्ट
फिरि एकदिन जिभै हुनोलो, सब बंद
सुजाया रैगया, बंद मोल बठै आँगना पाथर
माठु-माठु जामन पडी ग्यो झाड़
और आँगन घेरी हालयो

द्वार में लाग्यो सांगलो लै उदास 
द्वारों साथ छोडी, आँगना पाथरो बठै बैठी ग्यो
धयूडा लाग्या द्वार, जसि कसि कै ठडी रयान
शैद उन आला कुना उम्मीद में
जब उईका खूटा पडयान पाथरो में आज
उन खूटा बठै और लै कुछ खूटा छ्या

क्वै नया क्वै पुराना
खुटा खुटा पचयान्या पाथर
थोड़ी देरे थे सकबकै गया, 
कुछ पुराना खुटा, जौ इनि खुटा संग गैब भौछ्या
आज वापस ना आरौछया 
शैद उन आब वापस नि आ कभै
पाथर आपनो मन मनै, खुश है रयान

वापस आया खुटा में, कुछ नन्तिना खूट लै छन
शैद फीरि वापस आजौ पुरानी रौनक
और फिर शुरू हो जौ ये आंगन में
पिठ्ठू, कंचा, गिल्ली डण्डा, बैट बॉलो खेल
फिरि इन पाथरों कवै सजादयौ
लेखि बैर अ आ इ ई, १ २ ३ ४।

~राजू पाण्डेय, 28-06-2020
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