शरम लागि जांछ्

कुमाऊँनी भाषा में कविता, शरम लागि जांछ्, Poem in Kumaoni language about the degradation of values, changing lifestyle due to urbanisation

🌷-:शरम लागि जांछ्:-🌻

रचनाकार: प्रकाश पाण्डेय
 
कत्ति चार  मैंस  ठाड़् है रौ,
एक दुसराक् मुख चैरौ,
बलाण्  हुणि तौ  मन है रौ् ,
ध्यान कथप हुणि जै रौ,
मन  में  कसमसाट है रौ,
को हुनल् अणकस्सै है रौ,
को  घरौक्  छ  पुछो  धैं,
के काम छ किलै जै ऐ रौ,
आब्  नमस्कार  कूँ नि कूँ, 
यस् सोचि  बेर  शरम लागि जाँ छ्।1।

झुंगराक्  बालाड़  देखै  नै, 
भट्ट गहत पछ्याणै नै,
बेड़ु तिमिल चाखै नै,
मडुवाक् र् वाट कभै खै यै नै,
गौंजि कसि हुँछ पत्तै नै,
सिसूणक् झणझणाट लागै नै, 
हिसाऊ किल्मोड़क् पत्तै नै, 
काफलाक् बोटन् गैये नै,
आँगणाक् भिड़न् भैटै नै,
योई सुणि बेर शरम लागि जाँ छ्।2।

आम् -बुबु दगाड़ नि धर,
इज् बाबुकि लागि नै डर,
जे मन आइ वी आफी कर,
खर्च करण में न्हैं कसर,
क्वे नि पुछन बात खबर,
चाण चितूण बिना टुटीं घर,
बाड़् ख्वाड़न् में रूनी सुंगर,
सब्बै जाग् पुजिगे मोटर,
चप्पल पैरि बेर रिस्या भितर,
शरमाक् मारी मुख लाल है जाँ छ्।3।

गोरु-बाछनाक् दौणि हराण, 
छाँ फानियैकि नौणि हराणि,
कानिन् झ्वाल् हाली पौण हराण,
उखल कुटी कौण हराण,
चहा कितलि में रूंछी पराण,
कढ़ै में जौल पकूंछी बौराण,
झपाव लागी त पुज छी मसाण,
अन्यार् पड़ी लाग् छी दिसाण,
सैणि-बैग सब छाव् कृसाण्,
आब् रंग-ढंग देखि,
शरम लागि जाँ छ्।4।

गौंक् बिरादर गौं में नै,
को काक् को भतिज पछ्याणै नै,
दाँति आँखोड़ के भौ में नै,
इष्टैकि झोलि क्वे ठ्या में नै,
भिमल भिजैई क्वे रौ में नै,
मांसाक् बेड़ू क्वे तौ में नै,
एक रुपैंकि चीज सौ में नै,
बिस्कूण हाली कैं पटौ में नै,
दन्यारि है उच्च सिसूणाक् बोट, 
याद करि बेर शरम लागि जाँ छ्।5।

🙏 प्रकाश पाण्डेय, हरिद्वार 🙏

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