
भुर्र चड़ी भुर्र’क साग
(कुमाऊँनी लोककथा)
लेखिका: रेखा उप्रेती
पहाड़’क एक गौं में एक सिद्द-साद आदिम रुछिं। नाम के भौ’य? कै’कं पत्त न… । चलो मिं वीक नाम ला’ट धर दिनुं। ला’ट भ’य पै ऊ!! जै’ल जस कौय उस्स कर दिनेर भ’य। काम-धाम लै के नि हुनेर भ’य वी कैल… हात-बुत सार दिनेर भ’य बस। किस्मत भलि भई वी’क …ब्या ह गोय। दुल्हैणि खूब होश्यार मिलि गे। वील सम्हालि दि ला’ट’कि ग्रहस्ती। खेति-बाड़ी, भैर-भितेर, धुर-धार सब्बे काम करनेर भई। ला’ट लै मदत करि दिनेर भ’य … कदिन लाकड़ फाड़ दि, कदिन बल्द जोत बेर हौ बा दि …जैल जस कॉय करि दिनेर भ’य। केs चीजक नाखार नि भ’य…
ला’ट कं बस एक्क सौक भ’य… भल-भल खाण हूँ मिल जो… जे कौला उंहूं, करि दिनेर भ’य, बस भलो-भल पके-पुके बेर खवे दी। ला’ट कि स्यैणि कं लै वीकि कमज़ोरि पत्त भई। जब लै के ठुल काम करूँण भ’य त उ खूब भल-भल पकवान बण बे दिनेर भयि …. आब ला’ट पड़ी गोय कुपाणी … दाल-भात, रोट-साग खाण हूँ दियो त नाक गन्युनेर भ’य… आब रोज-रोज को पकुनेर भ’य सिहल-पु… त एक दिन ला’ट कि स्यैणि कं दिक् लाग् गोय…. “ तुमकं भल-भल पकवान चैनी त आपण सरास ज आओ।”
बात ला’ट’कि मन ऐ गेय। हिट दि हो महाराज सरास हुणि। सरास ल याँ जे के भ’य, कत्थ मुलुक जाण पड्नेर भ’य… हिटने-हिटने ब्याव ह गेई। पै जसी-तसी पुजी गोय ला’ट सरास। सासु ल खुसि ह गेई …जवैं आई भ’य। खूब गड-बड चहा बड़े दि, मिट्ठ ले बड़ाई, खट्ट लै बड़ाई …भलीs खातिर कर.. सब्ब भलै लाग पै ला’ट कैं … पै एक चीज़ जो वील पैली नि खाई भयि ..उ में मन अटक गोय वीक…
“ यो के छू सासू?” पूछ लि पै सासु हूँ…
“च्याला यो गुनुक छन” सासुल बताय।
खूब खै-पि बेर रात सि गोय ला’ट, पै गुनुक’क सवाद मन में र गोय…
रत्ते-रत्ते उठ बे हिट दी आपण घर हूँ, वापिस.. सासुल आपणी चेली हूँ मस्त च्युड-आखोड़, खिल-खाज़ पोटलि में बादि बे दि दी। जाण बखत फिर पुछि लि सासु हुणि… “के नाम छि, जे रात खवा तुमुल…?” “गुनुक छी च्याला” सासुल कौ’य। आब महाराज ला’ट ल सोचि कि घर पूजण तक नाम भूलि जून। त ऊ पुर बाट गुनुक, गुनुक कूनै हिटन भ गोय। गाड़-गध्यार, धुर-जंगल सब पार कर, सुर वें लागि भाय… “ घर जूल …गुनुक खूंल ’
हिटने-हिटने साँझ पड़ी गे। आब थक लै गोय लाट। “एक जा’ग बैठ बेर पटै बिस लिनू” यस मन में आ’य त बैठ गोय| ‘घर जूल… गुनुक खूंल” सोचेंणय मन में। फिर आपणी पोटलि उठै बेर हिट दी आघिल कैं। गुनुक-गुनुक कू’ण रौछी पै एक जा’ग मस्त चाड़ बैठी भाय… जैस्क्ये ला’ट उत्ती पुज छौ, चाड़ भुर्र करि बेर उड़ ग्या’य। आब ला’ट कं भूलि गोय के खाछी सासू याँ… वी दिमाग में रै गोय- “ भुर्र चड़ी भुर्र…
घर पुज गोय हो महाराज “ भुर्र चड़ी भुर्र…” जपते-जपते।
आपुणि स्यैणि हूँ कौ’य – “ भुर्र चड़ी भुर्र’क साग बनें दे।” “ हाय! यो के साग भौ’य… मील त कब्भै नि खाई”
“तेरि ईजल पका… भलोs लागो …आब तू लै पका न” ला’ट जिद्द में अ गोय..। अघिल दिन कद्दु किसमक साग पकै हाल पै स्यैणि’ल …ला’ट कुनेर भ’य “यो ले नि खान… उ ल नि खान…।” “पै के खां छै?” “भुर्र चडी भुर्र’क साग खूंल .. जस त्यार ईजा’ल बणा छ” …. आब स्यैणि कं ऐ गेई जोर’क रीस… “झन खजेs तू..….आग लागी जोs त्यर गुनुक ज मुख…।”
“गुनुक छी रानी…गुनुक छी” ला’ट औरेs खुशि है गोय…।
रेखा उप्रेती, 23-06-2020

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