
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
दशूं अध्याय - श्लोक (३१ बटि १८ तक)
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जान्हवी।।३१।। सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुनः। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।।३२।। अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्दः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।।३३।।
कुमाऊँनी:
पवित्र करंण वाल् पौन, शस्त्र धारण करणीं श्रीराम, मांछन् में मगर और नदियों में गंगाजी लै मैं ई छूं और हे अर्जुन! सब्बै सृष्टियों क् आदि, मध्य तथा अन्त लै मैं छूं । सब विद्याओं में अध्यात्म विद्या और तर्कशास्त्रियों में फैसल करणीं लै मै ई छूं। आंखरन् में अकार, समासों में द्वन्द समास लै मैं छूं। मैं शास्वत काव और सृष्टि करणीं ब्रह्मा लै मिकैंणि ज्याणों।
(अर्थात् भगवान् ज्यु अर्जुनाक् माध्यमैल् हमूकैं यौ बतूंणई कि जां तक तुमरि बुद्धि, तुमर् तर्क या तुमरि कल्पना जै सकीं वां-वां मैं व्याप्त छूं, म्यर् बिना तुम संसार, संसाराक् सुख या दुखैकि कल्पना करी नि सकनां और तुलसीदास ज्यु लै रामचरितमानस में कूनीं कि - कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।) हिन्दी= समस्त पवित्र करनेवालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में श्रीराम, मछलियों में मगर तथा स्रोत/नदियों में गंगाजी मुझे ही जानो। हे अर्जुन! मैं समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अन्त हूँ। मैं ही समस्त विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ और तर्कशास्त्रियों में निर्णायक भी मैं ही हूँ। अक्षरों में मैं अकार हूँ और समासों में द्वन्द समास हूँ। मैं शास्वत काल भी हूँ और सृष्टाओं में ब्रह्मा भी मैं ही हूँ।
कुमाऊँनी:
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।।३४।।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।३५।।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।।३६।।
भगवान् ज्यु कुनई कि- मैं ई काव् (मृत्यु) छूं और आघिल् कैं हुंणी वलांकैं पैद् करणीं लै मैं छूं, स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा लै मैं ई छूं। मैं सामवेद में बृहत्साम और छन्दन् में गायत्री मंत्र छूं, म्हैंणू में मंगशीर और ऋतुवन् में बसन्त लै मिकैंणि ज्याणों। छल-कपट करंण वलां में मैं जु (द्यूत) छूं, तेजवानूं क् तेज, जीत, साहस और बलवानों कि ताकत लै मैं ई छूं।
(अर्थात् भगवान् ज्यु हर जाग् मौजूद छन्।)
हिन्दी= मैं सर्वभक्षी मृत्यु हूँ और मैं ही आगे होने वालों को उत्पन्न करनेवाला हूँ। स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति तथा क्षमा हूँ। मैं सामवेद के गीतों में बृहत्साम और छन्दों में गायत्री हूँ। महीनों में मार्गशीर्ष तथा समस्त ऋतुओं में वसन्त ऋतु हूँ। मैं मछलियों में जुआऔर तेजस्वियों में तेज हूँ। मैं ही विजय, साहस और बलवानों का बल हूँ।वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुसना कविः।।३७।। दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। मौनं चैवास्स्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।।३८।। यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।।३९।। कुमाऊँनी:यादवों में मिकैं वासुदेव और पाण्डवों में अर्जुन ज्याणौ। सब मुनियों में व्यास और विचारकों में शुक्राचार्य लै मैं ई छूं। उपद्रवियों क् दमन करणीं उपायों में दन्ड और जो जीत चांनी उनर् ल्हिजी नीति लै मैं ई छूं। रहस्यों में मौन, और बुद्धिमानों क् ज्ञान लै मैं छूं यौ ई नैं, हे अर्जुन! यौ सारी सृष्टि क् अधार बीज लै मैं छूं। यौ संसार में चर होओ या अचर यस् क्वे लै जीव न्हां जो मे बिना रै सकौ। (अर्थात्- भगवान् सब जाग, सब्बूं दगड़ और सब्बूं क् हृदय में व्याप्त छन्। यौ बात कैं समजंणी मैंस आंख बुजि बेर् लै भगवान् ज्यु कैं समजि/देखि और ज्याणि सकौं। अगर कैक् ज्ञान चक्षु खुलनै नैं त् क्वे क्य करि सकौं। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।)
हिन्दी= हे परन्तप! मेरी दैवी विभूतियों का अन्त नहीं है। मैंने तुमसे जो कुछ कहा, वह तो मेरी अनन्त विभूतियों का संकेत मात्र है। तुम जान लो कि सारा ऐश्वर्य, सौन्दर्य तथा तेजस्वी सृष्टियां मेरे तेज के एक स्फुलिंग मात्र से उद्भूत हैं । किन्तु हे अर्जुन! इस सारे विशद ज्ञान की आवश्यकता क्या है ? मैं तो अपने एक अंश मात्र से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर इसको धारण करता हूँ।
हिन्दी= मैं वृष्णिवंसियों में वासुदेव और पाण्डवों में अर्जुन हूँ। मैं समस्त मुनियों में व्यास तथा कवियों (विचारकों) में उशना (शुक्राचार्य) हूँ। अराजकता को दमन करनेवाले साधनोंमें मुझे दण्ड जानो, और जो विजय के आकांक्षी हैं उनकी नीति भी मैं ही हूँ, रहस्यों में मौन, और बुद्धिमानों में ज्ञान भी मैं ही हूँ। यही नहीं, हे अर्जुन! मैं समस्त सृष्टि का जनक बीज हूँ। ऐसा चर तथा अचर कोई भी प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना रह सके।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।।४०।।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्।।४१।।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थिति जगत्।।४२।।
कुमाऊँनी:
हे परन्तप! मेरि दैवी विभूतियों क् क्वे पार् न्हां। मिल् जो लै तुमूंकैं बता यौ त् एक संकेत मात्र छू। तुम ज्याणि लियौ कि सृष्टि क् सब ऐश्वर्य, सुन्दरता और तेज म्यर् येक् एक अंश मात्रैल् उपजी छन्। फिरि यतुक ज्यादे ज्ञानैकि लै क्ये जर्वत् छू? मैं त् अपुंण एक अंश मात्रैल् सार्रै ब्रह्माण्ड कैं धारण करि सकनूं।
(अर्थात् चाहे अध्यात्म जगत् हौओ या भौतिक, सब्बूं कैं भगवान् ज्यु द्वारा ताकत मिलैं और भगवान् ज्यु अगास, पताव और धरति पार् हर बखत्, हर घड़ी मौजूद छन् और भगवान् ज्यु कुनई कि मैं अपुंण एक अंश मात्रैल् सार्रै ब्रह्माण्ड कैं धारण करि सकनूं या सार्रै ब्रह्माण्ड में व्याप्त है सकनूं। तुम त् ज्यादे ज्याणणक् चक्कर में न पड़ौ। यतुक् भौत् छू कि मैं तुमर् उद्धार करणाक् ल्हिजी हर बखत् तैयार छू।)
🌹आपू सब गुणीजनों क् सहयोगैल् श्रीमद्भगवद्गीता ज्यु क् दशूं अध्याय पुरी गो। भौत्तै भौत् धन्यवाद् दगणियो।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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