
-:इतु पढ़ा लेखा: भाग-२:-
(तुमको इतना पढ़ाया लिखाया)
लेखिका: अरुण प्रभा पंत
च्यला के गत्त हैगे तेरि, पुर दिनमान लाग रुंछै। पुर गौं एक कर राखौतुम द्वि शैणि मैसनैल (औरत आदमी ने)। रत्तै द्वि फुलकी (दो रोटी) खैबेर गोछिया तुम और ऐल यो तीन बाजनीआब उंणौ छा। "इजा हमने गोबरधन चाचा के यहां गरम गरम दाल भात और बड़ीकी तरकारी (रसे वाली) खायी थी, मजा आ गयाथा, मैंतो उनकी बहू और बेटी को साफ सफाई और कुछ बातें बताने गयी थी और यह चाचाजी से गांव के स्कूल की हालत और बच्चों की संख्या जानने गये थे तो उनका छोटा लड़का इनसे मैथ्स (गणित) के सवाल पूछने लगा तो इतने में चाचीजी ने खाना लगा दिया, मना कैसे करते?"
"होय खाण तो भौतभल पकैं दैमंती"
इजा मैंने उनसे बहुत सी और बातें भी की जैसे बड़ी की पहाड़ी स्टाइल की सब्जी बनाना उन्होंने बताया, बिस्वार सिलपर कैसे पीसते हैं, मैं हौस्टल की पढ़ी हूं न तो मुझे बहुत कम बातें पता हैं अब मैं सब जानुंगी"।
"तुमन कं यां के कष्ट नि हैरैयो वां तुम सब भलीकै रुं छिंया डबल कमूं छिया, यां तो तुम आपण डबल लै लगै दिणौछा। आपण च्याल चेलि जो आय पढ़नैई, उनार लिजि लै के बचाला या सब यैं खर्च कर देला!"
तब भूपेश बलाणौं "इजा वां हम भ्यार वालनाक लिजि काम कर बेर डबल कमूं छियां, यां हम आपण लिजि काम करणैयां बदाल में यांक मैसनौक जीवन अगर बदल सकां तो यैहै ठुल और जोरदार काम और के है सकूं। यां हम जां जानू वां हमैरि इज्जत छू वहां हमन कं क्वे भली कै पछ्याणन लै न्हैंछी हम उनार लिजि पैंस कमूणी मशीनै जा भयां। हम उनार नौकर छिंयां, यां हम आपण मालिक छां।
सांच्चि बताओ बाबू-के हम के गलत करणैयां, हम तुमार छत्रछाया में छां, आपण जन्मभूमि कं समझणैयां, यहै ठुल न क्वे पुज न पाठ छू।
यो बीच में मैल कत्तु बाखयनाक घराक द्वार बंद हुण है बचयीं, कुछ लौडमौडन कं जो खाल्लि इथकै उथकै भटकंछी उनन कं काम में लगा, कुछ बुढ़ बाढ़िनाक आंख और दांतैकि जांच करूणैतै शिविर लगयीं, तौ तेरि ब्वारि सबन कं पढ़ूणै,भल भल बात सिखूंणै, वां भैर तो हम हजारों रुपैं तो आपण टैम पास करणाक खातिर खर्च कर दिछिंयांयां, उहै कम खर्च करबेर आपण गौंकं सुधाणैयां, शुद्ध खाण भलि हौ (हवा) और सबनैक आशीष लै ल्हिणैयां और के चैं, जांतक त्यार नाति नातिणिक सवाल छुउनैरि पढ़ाय लेखाय भलीकै हुणैऔर अघिल लै होली सही, फिर लै अगर हम आपण यो काम में सफल नि भयां तो देखीनी रौलि, एक कोशिश तो करणै चैनेर भै। नानछिना तु कुनेर भैयी-कोशिश करला तो कसी (कैसे)नि होल"
तब भूपेशाक बाबू कूण लागीं, "तु चुप रौ यों नानतिन हमौर गौंग्वैठ बदलबेरै छाड़ाल। आब इनन कं क्वे नि हरै सकन बस तु तनौर खाण पिणौक ध्यान धरिये और दि (दिया) जगूण बखत तनैरि हिम्मत और भलि रति मति (सद्बुद्धि) लिजि प्रार्थना करते रैये। तस संतान बड़भाग्यैल मिलैं। "भूपेशैक इज आंखन में आंसू भर बेर भितेर जानै रै दि जगूंण हुं सांझ है गेछी।
मौलिक
अरुण प्रभा पंत
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