पहाड़ देखादेखी भाभर

कुमाऊँनी कविता-गौं घरुं कि हाव छुटि गै, भाभर की भभरियोल मा, यां कमरपीड़ ह्वैजांछि, द्वि पू घा उचियौंण मा।  Kumaoni Poem migration from hills to plains

पहाड़ देखादेखी भाभर
रचनाकार: घनश्याम अण्डोला

गौं घरुं कि हाव छुटि गै,
भाभर की भभरियोल मा,
यां कमरपीड़ ह्वैजांछि 
द्वि पू घा उचियौंण मा।
बाटाई कना छन भाभर मा।
गौं मा छ्वेड़ी छु 
चालीस कुथल'क जिमदारो।
कतुप मन्खि दगै पटियाव गुजार करनां।
जब छ्व्ड़छ तुमल य गौं को बाटो।
तब कसिक भाभर जांणौ मडुवा को आटो।
गर्मियों कि छुट्टी मा घर ऊण फैशन चल्यो छ।
तांकि रौनैं साग-बाड़ कैं,यां के लगायो छ।
पैंली दयोरांणि-जिठाणियों'क खूबै महाभारत हुन्थ्यो।
आब तलि जायां बटि फूंनम खूबै गैल गपसप हुंथ्यो।
जब य पहाड़ में के झै नि हुनौ त,
तब य लुटुरा-कुटुरा
घरिया चांओ'क थैला कां बटि जाणीं।
तुमा'रा छ्वारौं क शौक चली च।
क्वे मुखानी की मखानी में फस्या छ।
क्वे शाम कू शमा मा रम्यां छ।
क्वे दारु हौर भांग का तरस्यां
क्वे हुक्काबार'क चिलम मा फस्यां।
सिगरेट पी-पी दिन छ कटीणौं।
हां!
तुमकू उनरो भविष्य ठिकै द्यखींणौं।
गाड़ी की लागिगै लत्।
फैशन'क नंगनाच।
उटपटांग चीजों कू शौक।
आपणी बोली-भाष कि नि धरी लाज।
आपणा ननां कि असलियत द्यखणैं तैं।
कभि राणिबाग कू बागपन देखि ल्हिणू।
वीका नाक बटि धुवां होलो उठण्यूं।
कभै द्येखि ल्हिण गलियों को बाटो।
गिज्यां बटिक लाल थूक ह्वल थूकणू।
कभै जाणि ल्हिणू वी,को मौन ब्रत।
कभै खंगाल ल्हिणू वीका गिजा।
कभै सुणी ल्हिणू पन्नी को छमणांट।
क्या पता तम्बाकू और गुटखा क थैल निकलि ज।
कभै सुणिं ल्हिणू नानियौं क एकलै-एकलै हसंणा।
और देखि ल्हिणू उनरो फून।
कति कैका मायाजाल मजि त न,फसणै।
कभै समझि जांण ऊनां क जिद करि बजार जांणौ।
कति क्वे कीचड़ और दलदल में न ल्हिजांणै।
तुम स्वचला तुमरो बच्चा भल नु कमौंणौ।।
कभै द्येखि ल्हिणूं नहर वाली रोड भी।
छटांग भरि'क छ्वारा भी बोतल ह्वल घुटकौंणौ।
बेमतलब का रुपया जब तलक इनूकैं मिलते रौलो।
तुमारा नौनिहाल सदा तैं बिगड़ि जाला।
तब ना इथैक, ना उथैक रौला।।
©घनश्याम अण्डोला, 21-01-2019

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