खरी-खरी 912 - मनखियेकि बात

मनखियेकि बात-कुमाऊँनी कविता, kumaoni poem about death is the reality of life,kumaoni bhasha ki kavita jindagi ke bare mein, kumaoni kavita

खरी-खरी-912: मनखियेकि बात

रचनाकार : पूरन चन्द्र काण्डपाल

मंखियैक जिंदगी 
लै कसि छ,
हव क बुलबुल
माट कि डेल जसि छ।

जसिक्ये बुलबुल फटि जां
मटक डेल गइ जां,
उसक्ये सांस उड़ते ही
मनखि लै ढइ जां।

मरते ही कौनी 
उना मुनइ करि बेर धरो,
जल्दि त्यथाण लिजौ
उठौ देर नि करो।

त्यथाण में लोग कौनी
मुर्द कैं खचोरो,
जल्दि जगौल
क्वैल झाड़ो लकाड़ समेरो।

चार घंट बाद
मुर्द राख बनि जां,
कुछ देर पैली लाख क छी
जइ बेर खाक बनि जां।

मुर्दा क क्वैल बगै बेर
लोग घर ऐ जानीं,
घर आते ही जिंदगी की 
भागदौड़ में लै जानीं।

मनखिये कि राख देखि 
मनखी मनखी नि बनन,
एकदिन सबूंल मरण छ
य बात याद नि धरन।

पूरन चन्द्र काण्डपाल, 28.08.2021

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