
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
सत्रहूं अध्याय - श्लोक (०१ बटि ०८ तक)
अर्जुन उवाच -
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।१।।
श्रीभगवानुवाच -
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।२।।
सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयः पुरुषो यो यछ्छ्रद्धः स एव सः।।३।।
यजन्ते सात्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तमासा जनाः।।४।।
कुमाऊँनी:
अर्जुन कूंण लागौ कि- हे कृष्ण ज्यु! जो लोग शास्त्रों क् नियम पालन नि करन् और अपंणी कल्पनाल् पुज करनीं उनरि स्थितिक् बार् में बताओ ? ऊं सतगुणी, या रजोगुणी, या फिरि तमोगुणी क्ये छन् ? श्रीभगवान् ज्यु कुनई - देहधारी जी वाला जो गुण अर्जित करि रयीं उनरि अनुसार वीकि श्रद्धा सतोगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी हैं छ। येक् बार् में सुणौ - विभिन्न गुणौंक् अनुसार मनखि आपू में एक विशेष प्रकारैकि श्रद्धा पैद् करूँ वीं गुणों द्वारा वीकि पच्छ्याण हैं, सतगुणी मनखि द्याप्तनैकि पुज करूँ, रजोगुणी मनखि यक्ष और राक्षसों कि पुज करूँ और तमोगुणी मनखि भूत, प्रेतादिक् इनर् पुज करूँ।
(अर्थात् जो शास्त्रों कि बात कैं नि मानन ऊं अपंण अलगै विधान बणै ल्हिनी और अपंण-अपंण भौतिक गुणौंक् हिसाबैल् पुज करनीं, जो मनखि सतोगुणी हूँ ऊ त् द्याप्तों कि पुज करूँ और द्याप्त अपंणि सामर्थक् हिसाबैल् ऊनूकैं फल दिनीं, जो मनखि रजोगुण में लिप्त छू ऊ यक्ष और राक्षसों कि पुज करनीं और उनरै जस् भाव कैं प्राप्त हुंनी। फिरि जो तमोगुणी प्रवृत्तिक् मनखि छन् ऊं त् भूत और प्रेतनकि पुज करनीं तब उनर् जस भाव कैं प्राप्त हुंनी। यौ प्रकारैल् शास्त्र सम्मत विधान जो छू ऊ हितकर छू।)
हिन्दी= अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! जो शास्त्र के नियमों का पालन न करके अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कौन सी है? वे सतोगुणी हैं, रजोगुणी हैं या फिर तमोगुणी हैं? श्रीभगवान् ने कहा- देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार उसीकी श्रद्धा तीनों प्रकार की हो सकती है, अब इसके विषय में सुनो - विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है। अपने द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार ही जीव को विशेष श्रद्धा से युक्त कहा जाता है। सतोगुणी व्यक्ति देवताओं को पूजते हैं, रजोगुणी व्यक्ति यक और राक्षसों को पूजते हैं और तमोगुणी व्यक्ति भूत-प्रेतों को पूजते हैं।अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।५।।
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तानविद्ध्यासुरनिश्चयान्।।६।।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ।।७।।
आयुः सत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्यां स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः।।८।।
कुमाऊँनी:
जो लोग घमंड और अहंकार क् वश में है बेर् तपस्या और व्रत त् कठोर करनीं पर जो शास्त्र सम्मत नि हुनि और काम या आसक्ति द्वारा प्रेरित हैं, यस् मूरख मनखि शरीर कैं त् कष्ट दिनै छीं पर शरीर भितेर जो आत्मा छू वीकैं लै कष्ट दिनीं, यस् मनखि असुर कयी जानीं। प्रत्येक मनखि जो भोजन करूँ ऊ लै परकितिक् गुणों क् अनुसार तीन प्रकारक् हूँ, यौ ई बात तप और दान पार् लै लागू हैं। आब उनर् भेदूंक् विषय में सुणौ। जो भोजन सात्त्विक लोगन् कैं भल् लागूं ऊ आयु बढ़णी, जीवन शुद्ध करणीं, ताकत, स्वास्थ्य, सुख और तृप्ति प्रदान करणीं हूँ। यस् भोजन रसमय (स्वादिष्ट), स्निग्ध (कोमल) स्वास्थ्य प्रदान (आंग लागणीं) और हृदय कैं भल् लागणीं हूँ।
(अर्थात् कुछ लोग हठपूर्वक या स्वार्थ पूर्वक (हे भगवान् म्यर् करोबार में वृद्धि है जालि त् मी एक दिन वर्त (उपवास) धरूल् या एक खुट पार् ठाड़ है बेर तप करूल् इत्यादि) तप करनीं ऊं यौ शरीर कैं ता कष्ट दिनैं छीं पर शरीर भितेर जो परमात्मा बैठी छू ऊ कैं लै कष्ट दिनीं और यस्सै लोग असुर कयी जानीं। मनखि जो भोजन करूं ऊ लै अपंणि परकितिक् गुणोक् अनुसारै करूँ, सात्विकी मनखि साद् भोजन करूँ जो आयु में वृद्धि करूँ, स्वास्थ्य सई धरौं, जीवन में शुद्धता पैद् करूँ, सुख और तृप्ति प्रदान करूँ। यस् भोजन रसमय और स्निग्ध हूँ और मनखिक् स्वास्थ्य और बुद्धि कैं निर्मल बणां। तब्बै कूनीं कि-जैसा खावे अन्न तैसी उपजे बुद्धि।)
हिन्दी= जो लोग दम्भ तथा अहंकार से अभिभूत होकर शास्त्र विरुद्ध कठोर तप और व्रत करते हैं, जो काम तथा आसक्ति द्वारा प्रेरित होते हैं, जो मूर्ख हैं तथा जो शरीर के भौतिक तत्वों को तथा शरीर के भीतर स्थिति परमात्मा को कष्ट पहुंचाते हैं, वे असुर कहे जाते हैं। यहां तक कि प्रत्येक व्यक्ति जो भोजन पसन्द करता है, वह भी प्रकृति के गुणों के अनुसार ही तीन प्रकार का होता है। यही बात दान तथा तपस्या के लिये भी सत्य है, अब उनके भेदों के विषय में सुनो। जो भोजन सात्त्विक लोगों को प्रिय होता है, वह आयु बढ़ाने वाला, जीवन को शुद्ध करनेवाला तथा बल , स्वास्थ्य, सुख तथा तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है, ऐसा भोजन रसमय, स्निग्ध, स्वास्थ्यप्रद तथा हृदय को भगाने वाला होता है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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