लागी भीजी

कुमाऊँनी कविता - लागी भीजी, Poem in Kumaoni language, Kumaoni Bhasha ki Kavita, Kumauni Poetry

लागी भीजी

रचनाकार: भास्कर जोशी

ठीट चहाँ जंगल जैरछी
धुरका-धुरूक भाजणों छी
एक आछो पाछिल बटी काव मुनेई
मैं बिलबिलान है गोछी।

कस छि, के छि उ, काव मुनेई
अन्ताज जस नि आयी
के हुनल, आजी तले समझ में नि आई
डरे मारी आंग, लग-लगे गोय। 

ब्याव हूँ ख्वर भारी हैगोय
हाथ, खुट कम्मर टूटी जस ग्याय
घर वाल ले परेशान है गेछि
उनुल अंतज लगे हैछी
के न के लाग गो इपर आज।

कैले रै मंतर, कैले झाड़-फूंक कर
कैले मार्चे धूं लगाय
सबले आपण-आपण जोर लगाय
लेकिन चार हाथ-खुट छोड़ी पड़िये रॉय।

रातक दस बाज गेछि
घरवलांक ले नींद हराम है गेछि
रातै दस बजी दौड़ी डांगरिये पास
डांगरी कणी हातों-हात बुले ली आयी।

डांगरियल दुलेण लगाय
द्याप्त नाचण भैगाय
द्यातुं केँ एक थाई में खारुन देयी गोय
मगेंले द्याप्तों समणी बैठाइ गोय।

द्याप्तों जजिया जय मामू शुरू हैगोय
म्यर पूठ में जोर जोरल हाथक बददैक मारी गोय
द्याप्तोंल कौय रे, पै स्वकार बाबु
इपर लागी भीजी छू रे य।

घरवालुंल हाथ जोड़ी बेर
पूछ मांगी गोय द्याप्त हैं
हे ! द्याप्ता त्वी बता के लागी भीजी छू इपर
जे कौल से द्युल, म्यर नान ठीक हैंयी चें।

द्याप्त जोर-जोरल नाची बेर कुणेछि
पाई स्वकार बाबू य जल भैरों छाया लागी रे
रोट-भेट, खिचड़ी दिण पडेल इगें
पजे तुमर नान य छाव हैजाल रे।

पै स्वकार बाबु !
ऐल टिक बभुती लगे जानू
छ: महीने करार रखी जानू
छ: महेण बाद फिर पुजुल रे बाबु।

म्यर मुनव में बभुती टिक लगायी गोय
चाऊँवक मोत्यों छणकी ग्याय
जान-जाने द्याप्त कै गेछी
पै रे स्वकार बाबु छाव हौ
राजी रौ, ख़ुशी रौ।

पं. भास्कर जोशी, 17-01-2014 पर 1:18 AM

पं. भास्कर जोशी के ब्लॉग पागल पहाड़ी से साभार 


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फोटो सोर्स: गूगल

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