
खाल्ली फसक....रेब्दा वां जाग
लेखक - ज्ञान पंत
........रेब्दा वां जाग'कि खबर मिली त मूँ ले किसनां'क दगाड़ तैयार है गियूँ। असल में जाग् ले जागर जसो हुँछ मगर यमे पुज नानि - नानीं हुनेर भै। ब्यावा टैम में पुज जानां त भल हुँछी मगर हम घर बटी खै पी बेरि पुजां त वां आरती लागी भै। दूप दीप जागी भै और देवी गीत चलि रयी भ्या। आरती है सक्छी त सब चुप है है ग्या। एकलि कौ कि हिटौ आब् खाँणीं खै ल्हीयी जावौ पैं। रेब्दा 'लि ङँगैरी, जगैरी, भगैरी'न हीं स्पेशल इंतजाम करी भै...... आलु गोभी'क साग, रैत, खट्टै, खीर और एक टपुकी साग'क दगाड़ खीर ले बणैंयी भै। मिठै नाम पर आजि पु, सिंघल ले भयै।
उ सब हाथ् खुट ध्वे बेरि खाँण् ही बैठा त जगतुवै नजर मैं में पड़ी ....., "ओ हो मुन्ना गुरु पैंलाग - कब आछा हो? आओ तुम ले खै ल्हीयौ..... " मैलि मुनि हल्के बेरि साफ ना के दे और यो ले बता कि हम सब खै बेरि ऐ रयाँ और तुम लोग खाओ। जगत सींग ङँगैरी, म्योर क्लासफैलो भ्यो चार में और पी०डबुल०डी में मेट भ्यो। यसी कै जगैरी भगैरी ले काम - धामै वाल् म्या.... शिबौ, भुखै ले कामन् हैयी म्या कामन! पुर द्वि घान पिस्वाँ र्'वाट स्वेर ग्या हो। उसी चुपड़ि र्'वाट कां मिलनेर भै उनन कैं - आज मिला त नेऊँण जा लाग् कौ।
खै पी बेरि सब आपण ठौर बैठि ग्या और सामुँणि बै रेब्दा हौरनां पछिल तरफ हम ले बैठां। एक किनार लै स्यैंणी बैठान। रेब्दा चाख् पुर भरी ग्यो। तबै जगतुवै लि कौछ ..... होय हो पणज्यू शुरु करी जाऔ पैं? सबनलै होय कै त सामुँणि बै थायि बाजण भै गे। दुहार'लि हुडुक लगा.... दूँग दुँग --- दुदूंग दुंग दुंग और भगैरियैलि भाग लगै ..... हाआ आआआआ - दशमैणी भगवती कल्याँण जागी ग्यानां। यसी कै ले क्याप कौ कि भूमी का भूमिया /डाना का गोरिया/नौलिंगा देवा/भगवती मय्या और ले क्याप काथ् लगैयी ग्या जो मैं याद न्हाँतिन।
जोरदार लागी भै सब मगर डँगरी शान्त बैठी भै जाँणि के हैयी नि रय। किनार लै द्वि जागी भै। थायि में चावौं ले भ्या और जो ले स्यैंणि मैस आय् - घर बटी लायी एक मुट्ठी चाऔ थायि म धरि दिनेर भै..... दै हो परमेश्वर ! पत्ती धरिया हो..... मगर वां त मेरि पैलाग तुमैरि कत्थप हैयी भै। जग्तुुवैलि गव् जाँणैं स्वेरी भ्यो त वी आँङ द्याप्त कां बटी ऊँछी.... बैठि बैठियै उकैं नींन ऐ पड़ी। गौं वालनैलि समझी कि जगतू धियान लगै ल्ही रौ कै। तबै हमार पछिल बै है एक लौड फूँ-फाँ कर फटक मारनै ऐ पुज। वीलि थायि में है चावौं टिपि बेरि एक खुट्टी नाँच करण लगा त द्वि तीन सग्याँण मैंसनैलि पकडि बेरि भी में च्याप देछ। थ्वाडै देर में उ ठंड है ग्यो मगर म्यार बगल में चकरपाटि हालीं बस्सी'का आपण जाँघौड़ फटकूँण भै ग्या।
उनैलि सुसांट करण लगा त मैलि ठसक मारि बेरि आँख ताणिन और बस्सी 'का शान्त करै द्या...... बस्सी 'का म्यारै सनिक भै मगर रिस्त में काक् हुँणा बावजूद दोस्त ज्यादे भै। हमैलि नान्छिनान घोड़ा छाप बिड़ि खूब खायी भै। जब जगतुवैकि नींन टुटि त वीलि मलिकै ध्यान लगा और कूँण लाग कि आज सपड़ि न्हाँ हो पंडिज्यू ..... नान्तिनोयि है पडी कूँछा। छरबर है गे - सब छरबर है गे!..... आब् के होल पैं? रेब्दा'लि पुछौ त कूँण लाग कि भोल आजि कोशिश करी जालि। देखौ धैं के पत्त भोल द्याप्त ऐ जाऔ। गारंटी के नि भै महाराज ..... एक बखत बेलकोट में दयाप्त औतरण में पुर सात दिन लागीं सात दिन।
..... घर ऊँण बखत मेलि बस्सी का थैं कै "चचा , तुमेलि स्याँणोव न करि आज। थ्वाड पैलीं अतर जाना त भोल'क चक्कर नि पडन। बिचार रेब्दा इनन कां बटि खवाल-पेवाल कै हरौछा"। तब बस्सी कां बलाँण कि यार उ कट्ठू (गायि ले बकी) पत्त न कां बटि ऐ मरौ..... चलो भोल है जाल हो किशन..... आब गलती नि करुँ यार।
.........॥ दुुहार दिन हम बखत है पैंली पुजि गेछियाँ किलैकि आज द्याप्त औतरण जरुरी छी। जगतु'लि पुजन चोट कै कि आज ज्यादे भूख न्हाँ महाराज। मैलि पुछौ किलै त कूँण लाग "आज दिन में शिकार खै राखौ हो पणज्यू"। आब मूँख बिटौव त करणै पड़ौल........ नि भयै हो रम्दा? रम्का'लि मुनि हल्कै बेरि है कौ। फिर आरती बाद उन सबनलै खायि और आरामैलि शुरुआत करी। आज ले कुल मिलै बेरि खानेर चौद पनर है गेछी। मैलि बस्सी 'का थैं कयी भै कि जब मैं तुमन कै ठसक लगून तुम समझि जाया। जगैरि भगैरि 'नै लि क्याप काथ् लगैयी भै। जग्गू डगेरी कत्थप ध्यान लगै बेरि सुर-र्र - सुर कनै चावौ खितण बैठौ त मैलि बस्सी'का ले ठसक लगै। फिर त उनार आँङ करेंट दौड पड़ौ। आँखन में बल्ब जास जागीं त उँ उड़ण भै ग्या।
टोक्याव छाडि बेरि उनैलि थायि में है चावौं टिपि बेरि बेरि इदकै उथकै खितण लगान। रेब्दा ख्वारुन चावौ मारी......दै सौंकारा ! दै पै दै जा त्योर भल है जौ। आब के न्हाँ। मैं खुशि छूँ और रम्का उज्यँण चै बेरि कूँण लाग......पाल सरणां "ओड़" कैं तु एक हाथ आपणि तरफ सरकै बेरि टुणिं बोट'क बरोबर लगै दिए बस...... यतु कै बेरि बस्सी'का उतांण ढाँग है ग्या। सबनलै समझी द्याप्त चौणींण न्हाँ त जगतू ङगरी च्याट्ट उठौ और पाँणि छिट खित बेरि बस्सी का कपाव'न भभूत लगूँण बैठौ मगर उनैलि चूँ नि करि। जगतु'लि भद्याऊन डुबुक जस क्याप बुदबुदाट ले करौ कि हे परमेश्वरौ! गलती माँफ करिया, गजबजाट हचनेरै भै - तुम त गियानी भया....... सबासब घबरै ग्या मगर असल बात मैं कैं पत्त छी कि बस्सी'का स्वांग लगै ल्ही रौ कै। थ्वाड़ देर बाद मैलि आजि ठसक लगै त उनन मे पराँण जस ऐ पड़..... उनैलि आँख फरकायै त जगतु खुटन में लोटी पड़ौ। फिर सबनलै हाथ जोड़ि बेरि असीक ल्हेछ और आपण घर हीं बाट् लाग्।
...... हमार पहाड़'न में द्वि गाड़नां बीच मेँ एक ढुँग धरी हुँछ जै कैं "ओड़" कयीं जाँछ। यो ओड़ द्वि गाड़नै'कि बीच सीमा रेखा तय करौं। यकैं "जीरो ढुँग जाग्" या यो जाग् कैं ...... "न तेरि न मेरि जाग्" कै सक्छा.....। दुन्नी मेँ सब तरफा मैंस हुनेर भ्या। कैले है सकौं कि ज्यादती ले करी हौ मगर तीन पुस्तनैं बात ल्ही बेरि आज ले हारी बिमारी मेँ कयी जाऔ कि..... "घात हालि राखी कै" त बात अणकसी जसि लागैं मगर डौं घरन आजि ले लोग सोचनैरे भ्या। रम्का कैं यो बात सुणन में ऐ कि उनार बाबुलि पाल् सरण में टुणीं बोटा नजीक एक गाड़् में ओड़ कैं एक हाथ भान्ज्यू तरफ सरकै दे त भानज्यू 'लि भगवती तरफ दुहौर आँगुव नचै बेरि घात हालि राखी कि ..... हे कोटगाड़ी मय्या! आब तुयी न्या करिये न्या !
....उथैलि बात आई गैयी है गे मगर बुड़ मैंस अक्सर कै दिनेर भ्या "रामदत्तौ, त्यार बौज्यूलि भल नि कर यार! भन्दा बिचार डाढ़ मारनै गो.... शिबौ ~~ शिब.... " रम्का 'क पुर नाम राम दत्त पंत भै । आब् के ऊँच नींच भयी त रम्का कैं सोच पड़ि जनेर भै जै निराकरणां लिजी यो जाग् लगैयी गोछी ..... पुराँण टैम में जब मैंस मनसा वाचा कर्मणां ले पवित्र हुँछी त इन सब बातन में ले के नक भल जरुर हुन्योल किलैकि तब न पुलिस छी, न कोर्ट छी और दवायि पाँणीं नाम पर कोसन दूर बैद्य ज्यू हुँछी मगर आब् सब बदयी गो.... यै मतलब यो नि भ्यो कि मैं कैं ईष्ट देवन में या देवभूमि शक्ति मे भरौस न्हाँ कै मगर एक बात जरुर सोचूँ कि द्याप्त कभै कैको गट नि करन..... यो हमार करम और प्रारब्ध भै जो हमन नक भल सब यायीं देखण पणौं । सोचौ धैं! आज मैं बस्सी का कैं ठसक नि लगून्यूँ त जगतु डँगैरी दिन में शिकार खै बैरि पत्त नै कतु दिन द्याप्त अतरुँणैं में लगै दिन ! .....
दिवाई बधै छ हो खाल्ली फसक में
ज्ञान पंत, 17-10-2017

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