
दिन नि अय
रचनाकार: रमेश हितैषी
दिन अय दिन गय ऋतु मास लौटनै रय।
पर जो ज्यान गय उ लौटि नि अय।
बस हम उनरि बाटि कें चाइयै रय।
फागुण गोय चैतक आस में रय।
आड़ि घुगुति लौटि ए गय।
डाई बोट्यौ में उनूल घोळ लगाय,
हम उझड़ी घोळ कें चाइयै रय।
सारि पंयाई फूलुल ढकि गय,
बुरांस प्यौलि मगन है गय।
पतझड़क बाद फूल खिलि गय,
हम फुल्यारुकि बाटि कें चाइयै रय।
मनमौजी होल्यार होरि लगणि अय।
सराबक नसम बौया जै बनी हय।
काशी, मथुरा कि होरि कैकें याद छ,
हम उ जिलारों बाटि कें चाइयै रय।
लोग कुड़ि, बखाइ गौं खालि करनै गय।
एक एक करि बै उन्हा सरकनै गय।
थौव कौतीक सौ संस्कार सब भूलि गय,
थौव लै कौतग्यारुकि बाटि कें चाइयै रय।
अब च्येलि न ब्वारी सब अंग्रेज़ है गय,
कैकि खुद न भांटुइ सब बिरूठ है गय।
इनु लिबै बार त्यौहारुकि रौनक छि,
यौ दानि पराणि ऊनरि बाटि कें चाइयै रय।
देशक खातिर कटुक सपूत गंवय,
फिरि लै हमर भल दिन नि अय।
20 साल में 10 मुख्यमंत्री है गय,
हम आज लै विकासकि बाटि कें चाइयै हय।
सर्वाधिकार@सुरक्षित, March 23, 2021

श्री रमेश हितैषी
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